ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १३७
देवता, महाविराट् और स्वल्पविराट्—सभी उन परम प्रभु परमात्माके अंश हैं। प्रकृति भी उन्हींका अंश कही गयी है। वे श्रीकृष्ण दो रूपोंमें विभक्त हो जाते हैं—एक द्विभुज और दूसरे चतुर्भुज। चतुर्भुज श्रीहरि वैकुण्ठमें विराजते हैं और स्वयं द्विभुज श्रीकृष्णका गोलोकमें निवास है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत् (प्राकृत सर्गके अन्तर्गत) है। जो-जो प्राकृतिक सृष्टि है, वह सब नश्वर ही है। इस प्रकार सृष्टिके कारणभूत परब्रह्म परमात्मा नित्य, सत्य, सनातन, स्वतन्त्र, निर्गुण, निर्लिप्त और प्रकृतिसे परे हैं; उनकी न कोई लौकिक उपाधि है और न कोई भौतिक आकार। भक्तोंपर अनुग्रह करना उनका स्वरूप है—सहज स्वभाव है। वे अत्यन्त कमनीय हैं। उनकी अङ्गकान्ति नूतन जलधरके समान है। उनके दो भुजाएँ हैं। हाथमें मुरली है। गोपों-जैसा वेष और किशोर अवस्था है। वे सर्वज्ञ, सर्वसेव्य, परमात्मा एवं ईश्वर हैं। तुम उनके स्वरूपको ऐसा ही जानो।
इन्हींके दिये हुए ज्ञानसे विराट् पुरुष (विष्णु)-के नाभिकमलसे उत्पन्न ज्ञानस्वरूप ब्रह्मा अखिल ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं तथा सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता मृत्युञ्जय शिव संहारका कार्य सँभालते हैं। उन्हींके दिये ज्ञानसे तथा उन्हींके लिये किये गये तपके प्रभावसे वे उनके समान ही महान् एवं सर्वेश्वर हुए हैं। उन परमात्मा श्रीकृष्णके ज्ञानके प्रभावसे ही भगवान् विष्णु महान् विभूतिसे सम्पन्न, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी, सबके रक्षक, सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रदान करनेमें समर्थ, सर्वेश्वर तथा समस्त जगत्के अधिपति हुए हैं। उन्हींके ज्ञानसे, उन्हींके लिये की गयी तपस्यासे तथा उन्हींके प्रति भक्ति और उन्हींकी सेवासे प्रकृति सर्वशक्तिमती महामाया और सर्वेश्वरी हुई है। उन्हींके ज्ञान, भजन, तपस्या एवं सेवा करनेसे देवमाता सावित्री वेदोंकी अधिष्ठात्री देवी और वेदमाता हुई हैं, वेदज्ञा तथा द्विजोंकी पूजनीया हो गयी हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी सेवा और तपका ही प्रभाव है कि सरस्वतीको समस्त विद्याकी अधिष्ठात्री माना जाता है। अखिल विद्वान् उनकी उपासना करते हैं। सनातनी महालक्ष्मी धन और सस्यकी अधिष्ठात्री देवी तथा सब सम्पत्तियोंको देनेमें समर्थ हुई हैं। इन्हींकी उपासिका होनेसे दुर्गाको सब लोग पूजते हैं और वे सर्वेश्वरी सबकी कामनाएँ पूर्ण कर देती हैं। इतना ही नहीं, वे दुर्गतिनाशिनी दुर्गा इन्हींकी कृपासे समस्त गाँवोंकी ग्रामदेवी, सम्पूर्ण सम्पत्ति देनेमें समर्थ, सबके द्वारा स्तुत्य और सर्वज्ञ हुई हैं। उन्होंने सर्वेश्वर शिवको जो पतिरूपमें प्राप्त किया है, वह उनकी श्रीकृष्ण-सेवाका ही फल है।
श्रीकृष्णके वामभागसे प्रकट हुई श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्रेमसे आराधना और सेवा करके ही उनके प्रेमकी अधिष्ठात्री तथा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हुई हैं। श्रीकृष्णकी सेवासे ही उन्होंने सबसे अधिक मनोहर रूप, सौभाग्य, मान, गौरव तथा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें स्थान—उनका पत्नीत्व प्राप्त किया है। पूर्वकालमें राधाने शतशृङ्ग पर्वतपर एक सहस्र दिव्य युगोंतक निराहार रहकर तपस्या की। इससे वे अत्यन्त कृशकाय हो गयीं। श्रीकृष्णने देखा, राधा चन्द्रमाकी एक कलाके समान अत्यन्त कृश हो गयी हैं, अब इनके शरीरमें साँसका चलना भी बंद हो गया है, तब वे प्रभु करुणासे द्रवित हो उन्हें छातीसे लगाकर फूट-फूटकर रोने लगे। उन्होंने राधाको वह सारभूत वर दिया, जो अन्य सब लोगोंके लिये दुर्लभ है। वे बोले—'प्राणवल्लभे! तुम्हारा स्थान मेरे वक्षःस्थलपर है, तुम यहीं रहो। मुझमें तुम्हारी अविचल प्रेम-भक्ति हो। सौभाग्य, मान, प्रेम और गौरवकी दृष्टिसे तुम मेरे लिये सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रियतमा बनी रहो। संसारकी समस्त युवतियोंमें तुम्हारा सबसे ऊँचा स्थान है। तुम