ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १४१ आधारभूता और रत्नगर्भा हैं। रत्नोंकी खानें इनको गौरवान्वित किये हुए हैं। ये विशुद्ध चिन्मय वस्त्र धारण किये रहती हैं। इनके मुखपर मुस्कान छायी रहती है। सभी लोग इनकी वन्दना करते हैं। ऐसी भगवती पृथ्वीकी मैं आराधना करता हूँ।' इसी प्रकार ध्यान करनेसे सब लोगोंद्वारा पृथ्वीकी पूजा सम्पन्न होती है। विप्रेन्द्र ! अब कण्वशाखामें प्रतिपादित इनकी स्तुति सुनो। भगवान् विष्णु बोले- विजयकी प्राप्ति करानेवाली वसुधे ! मुझे विजय दो। तुम भगवान् यज्ञवराहकी पत्नी हो। जये ! तुम्हारी कभी पराजय नहीं होती है। तुम विजयका आधार, विजयशील और विजयदायिनी हो। देवि ! तुम्हीं सबकी आधारभूमि हो। सर्वबीजस्वरूपिणी तथा सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न हो। समस्त कामनाओंको देनेवाली देवि ! तुम इस संसारमें मुझे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तु प्रदान करो। तुम सब प्रकारके शस्योंका घर हो। सब तरहके शस्योंसे सम्पन्न हो। सभी शस्योंको देनेवाली हो तथा समयविशेषमें समस्त शस्योंका अपहरण भी कर लेती हो। इस संसारमें तुम सर्वशस्यस्वरूपिणी हो। मङ्गलमयी देवि ! तुम मङ्गलका आधार हो। मङ्गलके योग्य हो। मङ्गलदायिनी हो। मङ्गलमय पदार्थ तुम्हारे स्वरूप हैं। मङ्गलेश्वरि ! तुम जगत्में मुझे मङ्गल प्रदान करो। भूमे ! तुम भूमिपालोंका सर्वस्व हो, भूमिपालपरायणा हो तथा भूपालोंके अहंकारका मूर्तरूप हो। भूमिदायिनी देवि ! मुझे भूमि दो* । नारद ! यह स्तोत्र परम पवित्र है। जो पुरुष पृथ्वीका पूजन करके इसका पाठ करता है, उसे अनेक जन्मोंतक भूपाल-सम्राट् होनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। इसे पढ़नेसे मनुष्य पृथ्वीके दानसे उत्पन्न पुण्यके अधिकारी बन जाते हैं। पृथ्वी- दानके अपहरणसे, दूसरेके कुएँको बिना उसकी आज्ञा लिये खोदनेसे, अम्बुवाची योगमें पृथ्वीको खोदनेसे और दूसरेकी भूमिका अपहरण करनेसे जो पाप होते हैं, उन पापोंसे इस स्तोत्रका पाठ करनेपर मनुष्य छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है। मुने ! पृथ्वीपर वीर्य त्यागने तथा दीपक रखनेसे जो पाप होता है, उससे भी पुरुष इस स्तोत्रका पाठ करनेसे मुक्त हो जाता है। नारदजी बोले - भगवन् ! पृथ्वीका दान करनेसे जो पुण्य तथा उसे छीनने, दूसरेकी भूमिका हरण करने, अम्बुवाचीमें पृथ्वीका उपयोग करने, भूमिपर वीर्य गिराने तथा जमीनपर दीपक रखनेसे जो पाप बनता है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! मेरे पूछनेके अतिरिक्त अन्य भी जो पृथ्वीजन्य पाप हैं, उनको उनके प्रतीकारसहित बतानेकी कृपा करें। भगवान् नारायण बोले - मुने ! जो पुरुष भारतवर्षमें किसी संध्यापूत ब्राह्मणको एक बित्ता भी भूमि दान करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। फसलोंसे भरी-पूरी भूमिको ब्राह्मणके लिये अर्पण करनेवाला सत्पुरुष उतने ही वर्षोंतक भगवान् विष्णुके धाममें विराजता है, जितने उस जमीनके रजःकण हों। जो गाँव, भूमि और धान्य ब्राह्मणको देता है, उसके पुण्यसे
- विष्णुरुवाच - यज्ञशूकरजाया त्वं जयं देहि जयावहे। जयेऽजये जयाधारे जयशीले जयप्रदे ॥ सर्वाधारे सर्वबीजे सर्वशक्तिसमन्विते । सर्वकामप्रदे देवि सर्वेष्टं देहि मे भवे ॥ सर्वशस्यालये सर्वशस्याढ्ये सर्वशस्यदे। सर्वशस्यहरे काले सर्वशस्यात्मिके भवे ॥ मङ्गले मङ्गलाधारे मङ्गल्ये मङ्गलप्रदे । मङ्गलार्थे मङ्गलेशे मङ्गलं देहि मे भवे ॥ भूमे भूमिपसर्वस्वे भूमिपालपरायणे । भूमिपाहंकाररूपे भूमिं देहि च भूमिदे ॥ (प्रकृतिखण्ड ८। ५३-५७)