ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १५० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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प्रकट हो। वे उस समय क्रोधकी लीला करना चाहती थीं; अतः उनकी आँखें लाल कमलकी तुलना करने लगीं। उनका वर्ण पीले चम्पककी तुलना कर रहा था तथा उनकी चाल ऐसी थी मानो मतवाला गजराज हो। अमूल्य रत्नोंसे बने हुए नाना प्रकारके आभूषण उनके श्रीविग्रहकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके शरीरपर अमूल्य रत्नोंसे जटित दो दिव्य चिन्मय पीताम्बर शोभा पा रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णके अर्घ्यसे सुशोभित चरणकमलोंको उन्होंने हृदयमें धारण कर रखा था। सर्वोत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानसे उतरकर वे वहाँ पधारी थीं। ऋषिगण उनकी सेवामें संलग्न थे। स्वच्छ चँवर डुलाया जा रहा था। कस्तूरीके बिन्दुसे युक्त, चन्दनोंसे समन्वित, प्रज्वलित दीपकके समान आकारवाला बिन्दुरूपमें शोभायमान सिन्दूर उनके ललाटके मध्यभागमें शोभा पा रहा था। उनके सीमन्तका निचला भाग परम स्वच्छ था। पारिजातके पुष्पोंकी सुन्दर माला उनके गलेमें सुशोभित थी। अपनी सुन्दर अलकावलीको कँपाती हुई वे स्वयं भी कम्पित हो रही थीं। रोषके कारण उनके सुन्दर रागयुक्त ओष्ठ फड़क रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर वे सुन्दर रत्नमय सिंहासनपर विराजित हो गयीं। उनको पधारे देखकर भगवान् श्रीकृष्ण उठ गये और कुछ हँसकर आश्चर्य प्रकट करते हुए मधुर वचनोंमें उनसे बातचीत करने लगे।
उस समय गोपोंके भयकी सीमा नहीं रही। नम्रताके कारण कंधे झुकाकर उन्होंने भगवती राधिकाको प्रणाम किया और वे उनकी स्तुति करने लगे। परब्रह्म श्रीकृष्णने भी राधिकाकी स्तुति की। गङ्गा भी तुरंत उठ गयीं और उन्होंने राधाका स्तवन किया। उनके हृदयमें भय छा गया था। अत्यन्त विनय प्रकट करते हुए उन्होंने राधासे कुशल पूछी। वे डरकर नीचे खड़ी हो गयीं। उन्होंने ध्यानके द्वारा मन-ही-मन श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी शरण ली। गङ्गाके हृदयस्थित कमलके आसनपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्णने उस समय डरी हुई गङ्गाको आश्वासन दिया। इस प्रकार सर्वेश्वर श्रीकृष्णसे वर पाकर देवी गङ्गा स्थिरचित्त हो सकीं। अब गङ्गाने देखा, देवी राधिका ऊँचे सिंहासनपर बैठी हैं। उनका रूप परम मनोहर है। वे देखनेमें बड़ी सुखप्रद हैं। ब्रह्मतेजसे उनका श्रीविग्रह प्रकाशमान हो रहा है। वे सनातनी देवी सृष्टिके आदिमें असंख्य ब्रह्माओंको रचती हैं। उनकी अवस्था सदा बारह वर्षकी रहती है। अभिनव यौवनसे उनका विग्रह परम शोभा पाता है। अखिल विश्वमें उनके सदृश रूपवती और गुणवती कोई भी नहीं है। वे परम शान्त, कमनीय, अनन्त, परम साध्वी तथा आदि-अन्त-रहित हैं। उन्हें 'शुभा', 'सुभद्रा' और 'सुभगा' कहा जाता है। अपने स्वामीके सौभाग्यसे वे सदा सम्पन्न रहती हैं। सम्पूर्ण स्त्रियोंमें वे श्रेष्ठ हैं तथा परम सौन्दर्यसे सुशोभित हैं। उन्हें भगवान् श्रीकृष्णकी अर्द्धाङ्गिनी कहा जाता है। तेज, अवस्था और प्रकाशमें वे भगवान् श्रीकृष्णके ही समान हैं। लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने लक्ष्मीको साथ लेकर उन महालक्ष्मीकी उपासना की है। परमात्मा श्रीकृष्णकी समुज्ज्वल सभाको ये अपनी कान्तिसे सदा आच्छादित करती हैं। सखियोंका दिया हुआ दुर्लभ पान उनके मुखमें शोभा पा रहा है। वे स्वयं अजन्मा होती हुई भी अखिल जगत्की जननी हैं। उनकी कीर्ति और प्रतिष्ठा विश्वमें सर्वत्र विस्तृत है। वे भगवान् श्रीकृष्णके प्राणोंकी साक्षात् अधिष्ठात्री देवी हैं। उन परम सुन्दरी देवीको भगवान् प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानते हैं।
नारद ! रासेश्वरी श्रीराधाकी इस अनुपम झाँकीको देखकर गङ्गाका मन तृप्त न हो सका। वे निर्निमेष नेत्रोंसे निरन्तर राधा-सौन्दर्य-सुधाका पान करती रहीं। मुने ! इतनेमें राधाने मधुर वाणीमें