भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 190
१८०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कालीने सिंहनाद किया। देवीके उस सिंहनादसे दानव मूर्च्छित हो गये। कालीने बारंबार दैत्योंके लिये अमङ्गलसूचक अट्टहास किया। वे युद्धके मुहानेपर हर्षपूर्वक मधु पीने और नृत्य करने लगीं। उग्रदंष्ट्रा, उग्रचण्डा और कौट्टरी भी मधु-पान करने लगीं। योगिनियों और डाकिनियोंके गण तथा देवगण आदि भी इस कार्यमें योग देने लगे। कालीको उपस्थित देख शङ्खचूड़ तुरंत रणभूमिमें आ पहुँचा। दानव डरे हुए थे। दानवराजने उन सबको अभय दान दिया। कालीने प्रलयाग्निकी शिखाके समान अग्नि फेंकना आरम्भ किया, परंतु राजा शङ्खचूड़ने पार्जन्यास्त्रके द्वारा उसे अवहेलनापूर्वक बुझा दिया। तब कालीने तीव्र एवं परम अद्भुत वारुणास्त्र चलाया। परंतु दानवेन्द्रने गान्धर्वास्त्र चलाकर खेल-खेलमें ही उसे काट डाला। तदनन्तर कालीने अग्निशिखाके समान तेजस्वी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, किंतु राजा शङ्खचूड़ने वैष्णवास्त्रका प्रयोग करके उस अस्त्रको अवहेलनापूर्वक शीघ्र शान्त कर दिया। तब देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक नारायणास्त्र चलाया। उसे देखते ही राजा रथसे उतर पड़ा और उस नारायणास्त्रको प्रणाम करने लगा। शङ्खचूड़ने दण्डकी भाँति भूमिपर पड़कर भक्तिभावसे नारायणास्त्रको साष्टाङ्ग प्रणाम किया। तब प्रलयाग्निकी शिखाके समान तेजस्वी वह अस्त्र ऊपरको चला गया। तदनन्तर कालीने मन्त्रके साथ यत्नपूर्वक ब्रह्मास्त्र चलाया; किंतु महाराज शङ्खचूड़ने अपने ब्रह्मास्त्रसे उसे शान्त कर दिया। फिर तो देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक बड़े-बड़े दिव्यास्त्र चलाये। परंतु राजाने अपने दिव्यास्त्रोंसे उन सबको शान्त कर दिया। इसके बाद देवीने बड़े यत्नसे शक्तिका प्रहार किया, जो एक योजन लंबी थी। परंतु दानवराजने अपने तीखे अस्त्रोंके समूहसे उसके सौ टुकड़े कर डाले। तब देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक पाशुपतास्त्रको हाथमें उठा लिया और उसे चलाना ही चाहती थीं कि उन्हें मना करती हुई यह स्पष्ट आकाशवाणी हुई—'यह राजा एक महान् पुरुष है, इसकी मृत्यु पाशुपतास्त्रसे कदापि नहीं होगी। जबतक यह अपने गलेमें भगवान् श्रीहरिके मन्त्रका कवच धारण किये रहेगा और जबतक इसकी पतिव्रता पत्नी अपने सतीत्वकी रक्षा करती रहेगी, तबतक इसके समीप जरा और मृत्यु अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकती—यह ब्रह्माका वर है।'

इस आकाशवाणीको सुनकर भगवती भद्रकालीने शस्त्र चलाना बंद कर दिया। अब वे क्षुधातुर होकर करोड़ों दानवोंको लीलापूर्वक निगलने लगीं। भयंकर वेषवाली वे देवी शङ्खचूड़को खा जानेके लिये बड़े वेगसे उसकी ओर झपटीं। तब दानवने अपने अत्यन्त तेजस्वी दिव्यास्त्रसे उन्हें रोक दिया। भद्रकाली अपनी सहयोगिनी योगिनियोंके साथ भाँति-भाँतिसे दैत्यदलका विनाश करने लगीं। उन्होंने दानवराज शङ्खचूड़को भी बड़ी चोट पहुँचायी, पर वे दानवराजका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकीं। तब वे भगवान् शंकरके पास चली गयीं और उन्होंने आरम्भसे लेकर अन्ततक क्रमशः युद्ध-सम्बन्धी सभी बातें भगवान् शंकरको बतलायीं। दानवोंका विनाश सुनकर भगवान् हँसने लगे।

भद्रकालीने यह भी कहा—'अब भी रणभूमिमें लगभग एक लाख प्रधान दानव बचे हुए हैं। मैं उन्हें खा रही थी, उस समय जो मुखसे निकल गये, वे ही बच रहे हैं। फिर जब मैं संग्राममें दानवराज शङ्खचूड़पर पाशुपतास्त्र छोड़नेको तैयार हुई और जब आकाशवाणी हुई कि यह राजा तुमसे अवध्य है, तबसे महान् ज्ञानी एवं असीम बल-पराक्रमसे सम्पन्न उस दानवराजने मुझपर अस्त्र छोड़ना बंद कर दिया। वह मेरे छोड़े हुए बाणोंको काट भर देता था। (अध्याय १९)


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