ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 197, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १८७ मृत्युकालमें जो शालग्रामके जलका पान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको चला जाता है। उसे निर्वाणमुक्ति सुलभ हो जाती है। वह कर्मभोगसे छूटकर भगवान् श्रीहरिके चरणोंमें लीन हो जाता है— इसमें कोई संशय नहीं। शालग्रामको हाथमें लेकर मिथ्या बोलनेवाला व्यक्ति 'कुम्भीपाक' नरकमें जाता है और ब्रह्माकी आयुपर्यन्त उसे वहाँ रहना पड़ता है। जो शालग्रामको धारण करके की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, उसे लाख मन्वन्तरतक 'असिपत्र' नामक नरकमें रहना पड़ता है। कान्ते ! जो व्यक्ति शालग्रामपरसे तुलसीके पत्रको दूर करेगा, उसे दूसरे जन्ममें स्त्री साथ न दे सकेगी। शङ्खसे तुलसीपत्रका विच्छेद करनेवाला व्यक्ति भार्याहीन तथा सात जन्मोंतक रोगी होगा। शालग्राम, तुलसी और शङ्ख—इन तीनोंको जो महान् ज्ञानी पुरुष एकत्र सुरक्षितरूपसे रखता है, उससे भगवान् श्रीहरि बहुत प्रेम करते हैं। नारद! इस प्रकार देवी तुलसीसे कहकर भगवान् श्रीहरि मौन हो गये। उधर देवी तुलसी अपना शरीर त्यागकर दिव्य रूपसे सम्पन्न हो भगवान् श्रीहरिके वक्षःस्थलपर लक्ष्मीकी भाँति शोभा पाने लगी। कमलापति भगवान् श्रीहरि उसे साथ लेकर वैकुण्ठ पधार गये। नारद! लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और तुलसी—ये चार देवियाँ भगवान् श्रीहरिकी पत्नियाँ हुईं। उसी समय तुलसीकी देहसे गण्डकी नदी उत्पन्न हुई और भगवान् श्रीहरि भी उसीके तटपर मनुष्योंके लिये पुण्यप्रद शालग्राम- शिला बन गये। मुने ! वहाँ रहनेवाले कीड़े शिलाको काट-काटकर अनेक प्रकारकी बना देते हैं। वे पाषाण जलमें गिरकर निश्चय ही उत्तम फल प्रदान करते हैं। जो पाषाण धरतीपर पड़ जाते हैं, उनपर सूर्यका ताप पड़नेसे पीलापन आ जाता है, ऐसी शिलाको पिङ्गला समझनी चाहिये। (वह शिला पूजामें उत्तम नहीं मानी जाती है।) नारद! इस प्रकार यह सभी प्रसङ्ग मैंने कह सुनाया; अब पुनः क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय २१) तुलसी-पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसी-स्तवनका वर्णन नारदजीने पूछा- प्रभो! तुलसी भगवान् नारायणकी प्रिया हैं, इसलिये परम पवित्र हैं। अतएव वे सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीया हैं; परंतु इनकी पूजाका क्या विधान है और इनकी स्तुतिके लिये कौन-सा स्तोत्र है ? यह मैंने अभीतक नहीं सुना है। मुने! किस मन्त्रसे उनकी पूजा होनी चाहिये ? सबसे पहले किसने तुलसीकी स्तुति की है? किस कारणसे वह आपके लिये भी पूजनीया हो गयीं ? अहो ! ये सब बातें आप मुझे बताइये। सूतजी कहते हैं- शौनक ! नारदकी बात सुनकर भगवान् नारायणका मुखमण्डल प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने पापोंका ध्वंस करनेवाली परम पुण्यमयी प्राचीन कथा कहनी आरम्भ कर दी। भगवान् नारायण ऋषि बोले- मुने ! भगवान् श्रीहरि तुलसीको पाकर उसके और लक्ष्मीके साथ आनन्द करने लगे। उन्होंने तुलसीको भी गौरव तथा सौभाग्यमें लक्ष्मीके समान बना दिया। लक्ष्मी और गङ्गाने तो तुलसीके नवसङ्गम, सौभाग्य और गौरवको सह लिया, किंतु सरस्वती क्रोधके कारण यह सब सहन न कर सकीं। सरस्वतीके द्वारा अपना अपमान होनेसे तुलसी अन्तर्धान हो गयीं। ज्ञानसम्पन्ना देवी तुलसी सिद्धयोगिनी एवं सर्वसिद्धेश्वरी थीं। अतः उन्होंने श्रीहरिकी आँखोंसे अपनेको सर्वत्र ओझल कर लिया। भगवान्ने उसे न देखकर सरस्वतीको समझाया और उससे आज्ञा लेकर वे तुलसीवनमें गये। लक्ष्मीबीज (श्रीं),