भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 205

···· प्रकृतिखण्ड १९५

पाप करता है, वे सभी पाप तुम्हारे नामका स्मरण करते ही भस्म हो जायेंगे।*

इस प्रकार स्तुति करके जगद्धाता ब्रह्माजी वहीं गोलोककी सभामें विराजमान हो गये। तब सावित्री उनके साथ ब्रह्मलोकमें जानेके लिये प्रस्तुत हो गयीं। मुने! इसी स्तोत्रराजसे राजा अश्वपतिने भगवती सावित्रीकी स्तुति की थी, तब उन देवीने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये। राजाने उनसे मनोऽभिलषित वर प्राप्त किया। यह स्तवराज परम पवित्र है। पुरुष यदि संध्याके पश्चात् इस स्तवका पाठ करता है तो चारों वेदोंके पाठ करनेसे जो फल मिलता है, उसी फलका वह अधिकारी हो जाता है।

(अध्याय २३)


राजा अश्वपतिद्वारा सावित्रीकी उपासना तथा फलस्वरूप सावित्री नामक कन्याकी उत्पत्ति, सत्यवान्‌के साथ सावित्रीका विवाह, सत्यवान्‌की मृत्यु, सावित्री और यमराजका संवाद

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! जब राजा अश्वपतिने विधिपूर्वक भगवती सावित्रीकी पूजा करके इस स्तोत्रसे उनका स्तवन किया, तब देवी उनके सामने प्रकट हो गयीं। उनका श्रीविग्रह ऐसा प्रकाशमान था, मानो हजारों सूर्य एक साथ उदित हो गये हों। साध्वी सावित्री अत्यन्त प्रसन्न होकर हँसती हुई राजा अश्वपतिसे इस प्रकार बोलीं, मानो माता अपने पुत्रसे बात कर रही हो। उस समय देवी सावित्रीकी प्रभासे चारों दिशाएँ उद्भासित हो रही थीं।

देवी सावित्रीने कहा—महाराज! तुम्हारे मनकी जो अभिलाषा है, उसे मैं जानती हूँ। तुम्हारी पत्नीके सम्पूर्ण मनोरथ भी मुझसे छिपे नहीं हैं। अतः सब कुछ देनेके लिये मैं निश्चितरूपसे प्रस्तुत हूँ। राजन्! तुम्हारी परम साध्वी रानी कन्याकी अभिलाषा करती है और तुम पुत्र चाहते हो; क्रमसे दोनों ही प्राप्त होंगे।

इस प्रकार कहकर भगवती सावित्री ब्रह्मलोकमें चली गयीं और राजा भी अपने घर लौट आये। यहाँ समयानुसार पहले कन्याका जन्म हुआ। भगवती सावित्रीकी आराधनासे उत्पन्न हुई लक्ष्मीकी कलास्वरूपा उस कन्याका नाम राजा अश्वपतिने सावित्री रखा। वह कन्या समयानुसार शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान प्रतिदिन बढ़ने लगी। समयपर उस सुन्दरी कन्यामें नवयौवनके लक्षण प्रकट हो गये। द्युमत्सेनकुमार सत्यवान्‌का उसने पतिरूपमें वरण किया; क्योंकि सत्यवान् सत्यवादी, सुशील एवं नाना प्रकारके उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थे। राजाने रत्नमय भूषणोंसे अलंकृत करके अपनी कन्या सावित्री सत्यवान्‌को समर्पित कर दी। सत्यवान् भी श्वशुरकी ओरसे मिले हुए बड़े भारी दहेजके साथ उस कन्याको लेकर अपने घर चले गये।


* ब्रह्मोवाच
नारायणस्वरूपे च नारायणि सनातनि । नारायणात् समुद्भूते प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
तेजःस्वरूपे परमे परमानन्दरूपिणि । द्विजातीनां जातिरूपे प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
नित्ये नित्यप्रिये देवि नित्यानन्दस्वरूपिणि । सर्वमङ्गलरूपेण प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
सर्वस्वरूपे विप्राणां मन्त्रसारे परात्परे । सुखदे मोक्षदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
विप्रपापेन्धदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमे । ब्रह्मतेजःप्रदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
कायेन मनसा वाचा यत्पापं कुरुते द्विजः । तत् ते स्मरणमात्रेण भस्मीभूतं भविष्यति ॥
(प्रकृतिखण्ड २३ । ७९–८४)