ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २२७
रहती हैं, वे ही देवियोंमें महती होनेके कारण महालक्ष्मीके नामसे प्रसिद्ध हुईं। इस प्रकार द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्राणपति बने और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु लक्ष्मीके। द्विभुज श्रीकृष्ण गोपों और गोपियोंसे आवृत हो गोलोकमें अत्यन्त शोभा पाने लगे और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु भगवती लक्ष्मीसहित वैकुण्ठधामको चले गये। ये भगवान् श्रीविष्णु और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों समस्त अंशोंमें एक समान ही हैं।
भगवती श्रीमहालक्ष्मी योगबलसे नाना रूपोंमें विराजमान हुईं। वे सम्पूर्ण सौभाग्योंसे सम्पन्न होकर परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा, परिपूर्णतमा 'महालक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हो वैकुण्ठधाममें निवास करने लगीं। प्रेमके कारण समस्त नारीसमुदायमें वे प्रधान हुईं। वे स्वर्गमें इन्द्रकी सम्पत्तिस्वरूपिणी होकर 'स्वर्गलक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। पातालमें तथा मर्त्यलोकमें राजाओंके यहाँ 'राजलक्ष्मी' हुईं। गृहस्थोंके यहाँ 'गृह-लक्ष्मी' के नामसे पूजित हुईं। अपने कलांशसे ये ही गृहिणी भी कहलाती हैं। वे गृहस्थोंके लिये सम्पत्स्वरूपा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला हैं। गौओंकी जननी सुरभि तथा यज्ञपत्नी दक्षिणा भी वे ही हैं। क्षीरसागरके यहाँ उसकी कन्या हैं। कमलोंमें 'श्री' तथा चन्द्रमा और सूर्यमें 'शोभा' रूपसे उन्हींका निवास है। वे सूर्यमण्डलका अलंकार हैं। भूषण, रत्न, फल, जल, राजा, रानी, दिव्य नारी, गृह, सम्पूर्ण धान्य, वस्त्र, पवित्र स्थान, देवताओंकी प्रतिमा, मङ्गल-कलश, माणिक्य, मोतियोंकी सुन्दर मालाएँ, बहुमूल्य हीरे, चन्दन-वृक्षोंकी सुरम्य शाखा तथा नूतन मेघ—इन सभी वस्तुओंमें भगवती श्रीलक्ष्मीका अंश विद्यमान है।
मुने! सर्वप्रथम भगवान् नारायणने वैकुण्ठधाममें इन महालक्ष्मीकी पूजा की। दूसरी बार ब्रह्माजीने भक्तिपूर्वक इनका अर्चन किया। तीसरी बार भगवान् श्रीशिवने इनकी आराधना की। मुने! फिर भगवान् विष्णुने क्षीरसागरमें इनकी पूजा की। तदनन्तर स्वायम्भुव मनु, मानवेन्द्र, ऋषीश्वर, मुनीश्वर तथा साधु गृहस्थ—इन लोगोंने महालक्ष्मीकी उपासना की है। गन्धर्व और नाग आदिने पाताललोकमें इनका पूजन किया। भाद्रपदमासकी शुक्ल अष्टमीके सुअवसरपर ब्रह्माद्वारा ये सुपूजित हुईं। नारद! फिर भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें पूरे पक्षतक त्रिलोकीमें इनकी भक्तिपूर्वक पूजा होने लगी। चैत्र, पौष तथा भाद्रपदमासके पवित्र मङ्गलवारको भगवान् विष्णुने भक्तिपूर्वक तीनों लोकोंमें इनकी पूजाका महोत्सव चालू किया। वर्षके अन्तमें पौषकी संक्रान्तिके दिन मनुने अपने प्राङ्गणमें इनकी प्रतिमाका आवाहन करके इनकी पूजा की। तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें वह पूजा प्रचलित हो गयी। राजेन्द्र! मङ्गल, केदार, नील, नल, सुबल, उत्तानपाद-पुत्र ध्रुव, इन्द्र, बलि, कश्यप, दक्ष, मनु, विवस्वान् (सूर्य), प्रियव्रत, चन्द्रमा, कुबेर, वायु, यम, अग्नि और वरुणने मङ्गलमयी देवीकी उपासना की। इस प्रकार ये भगवती महालक्ष्मी सर्वत्र सब लोगोंसे सदा सुपूजित हुई हैं। ये सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। समस्त सम्पत्तियाँ इन्हींका स्वरूप हैं।
नारदजीने पूछा— भगवन्! श्रीमहालक्ष्मी भगवान् नारायणकी प्रिया होकर सदा वैकुण्ठमें विराजती हैं। उन सनातनीदेवीको वैकुण्ठकी अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। फिर वे देवी पृथ्वीपर सिन्धुकन्याके रूपमें कैसे प्रकट हुईं? उनका ध्यान, कवच और पूजनसम्बन्धी सम्पूर्ण विधान क्या है? पूर्वकालमें सबसे पहले उन महालक्ष्मीका स्तवन किसने किया था? इन सब बातोंका मेरे लिये विशद विवेचन कीजिये।
भगवान् नारायणने कहा— नारद! पूर्वसमयकी बात है। दुर्वासाके शापसे इन्द्र, देवसमुदाय तथा मर्त्यलोक—सभी श्रीहीन हो गये थे। रूठी हुई लक्ष्मी स्वर्ग आदिका त्याग करके