भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

लीलाओंको प्रकट करनेवाली देवी सरस्वती तथा उन लीलाओंका गान करनेवाले वेदव्यासको नमस्कार करके फिर जयका उच्चारण (इतिहास-पुराणका पाठ) करना चाहिये।

भारतवर्षके नैमिषारण्य तीर्थमें शौनक आदि ऋषि प्रातःकाल नित्य और नैमित्तिक क्रियाओंका अनुष्ठान करके कुशासनपर बैठे हुए थे। इसी समय सूतपुत्र उग्रश्रवा अकस्मात् वहाँ आ पहुँचे। आकर उन्होंने विनीत भावसे मुनियोंके चरणोंमें प्रणाम किया। उन्हें आया देख ऋषियोंने बैठनेके लिये आसन दिया। मुनिवर शौनकने भक्तिभावसे उन नवागत अतिथिका भलीभाँति पूजन करके प्रसन्नतापूर्वक उनका कुशल-समाचार पूछा। शौनकजी शम आदि गुणोंसे सम्पन्न थे, पौराणिक सूतजी भी शान्त चित्तवाले महात्मा थे। अब वे रास्तेकी थकावटसे छूटकर सुस्थिर आसनपर आरामसे बैठे थे। उनके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उन्हें पुराणोंके सम्पूर्ण तत्त्वका ज्ञान था। शौनकजी भी पुराण-विद्याके ज्ञाता थे। वे मुनियोंकी उस सभामें विनीत भावसे बैठे थे और आकाशमें ताराओंके बीच चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे। उन्होंने परम विनीत सूतजीसे एक ऐसे पुराणके विषयमें प्रश्न किया, जो परम उत्तम, श्रीकृष्णकी कथासे युक्त, सुननेमें सुन्दर एवं सुखद, मङ्गलमय, मङ्गलयोग्य तथा सर्वदा मङ्गलधाम हो, जिसमें सम्पूर्ण मङ्गलोंका बीज निहित हो; जो सदा मङ्गलदायक, सम्पूर्ण अमङ्गलोंका विनाशक, समस्त सम्पत्तियोंकी प्राप्ति करानेवाला और श्रेष्ठ हो; जो हरिभक्ति प्रदान करनेवाला, नित्य परमानन्ददायक, मोक्षदाता, तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति करानेवाला तथा स्त्री-पुत्र एवं पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाला हो।

शौनकजीने पूछा—सूतजी! आपने कहाँके लिये प्रस्थान किया है और कहाँसे आप आ रहे हैं? आपका कल्याण हो। आज आपके दर्शनसे हमारा दिन कैसा पुण्यमय हो गया। हम सभी लोग कलियुगमें श्रेष्ठ ज्ञानसे वञ्चित होनेके कारण भयभीत हैं। संसार-सागरमें डूबे हुए हैं और इस कष्टसे मुक्त होना चाहते हैं। हमारा उद्धार करनेके लिये ही आप यहाँ पधारे हैं। आप बड़े भाग्यशाली साधु पुरुष हैं। पुराणोंके ज्ञाता हैं। सम्पूर्ण पुराणोंमें निष्णात हैं और अत्यन्त कृपानिधान हैं। महाभाग! जिसके श्रवण और पठनसे भगवान् श्रीकृष्णमें अविचल भक्ति प्राप्त हो तथा जो तत्त्वज्ञानको बढ़ानेवाला हो, उस पुराणकी कथा कहिये। सूतनन्दन! जो मोक्षसे भी बढ़कर है, कर्मका मूलोच्छेद करनेवाली तथा संसाररूपी कारागारमें बँधे हुए जीवोंकी बेड़ी काटनेवाली है, वह कृष्ण-भक्ति ही जगत्-रूपी दावानलसे दग्ध हुए जीवोंपर अमृत-रसकी वर्षा करनेवाली है। वही जीवधारियोंके हृदयमें नित्य-निरन्तर परम सुख एवं परमानन्द प्रदान करती है।*

आप वह पुराण सुनाइये, जिसमें पहले सबके बीज (कारणतत्त्व)-का प्रतिपादन तथा परब्रह्मके स्वरूपका निरूपण हो। सृष्टिके लिये उन्मुख हुए उस परमात्माकी सृष्टिका भी उत्कृष्ट वर्णन हो। मैं यह जानना चाहता हूँ कि परमात्माका स्वरूप साकार है या निराकार? ब्रह्मका स्वरूप कैसा है? उसका ध्यान अथवा चिन्तन कैसे करना चाहिये? वैष्णव महात्मा किसका ध्यान करते हैं? तथा शान्तचित्त योगीजन किसका चिन्तन किया करते हैं? वेदमें किनके गूढ़ एवं प्रधान


* श्रीकृष्णो निश्चला भक्तिर्यतो भवति शाश्वती। तत् कथ्यतां महाभाग पुराणं ज्ञानवर्द्धनम्॥
गरीयसी या मोक्षाच्च कर्ममूलनिकृन्तनी। संसारसंनिबद्धानां निगडच्छेदकर्तरी॥
भवदावाग्निदग्धानां पीयूषवृष्टिवर्षिणी। सुखदाऽऽनन्ददा सौते शश्वच्चेतसि जीविनाम्॥
(ब्रह्मखण्ड १। १२—१४)