ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 261, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड
२५१
करनेपर भी देवता आदिको जब उसका कोई फल नहीं प्राप्त हुआ, तब वे सभी उदास होकर ब्रह्माजीके पास गये। ब्रह्माजीने उनकी प्रार्थना सुनकर जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिका ध्यान किया। बहुत समयतक भक्तिपूर्वक ध्यान करनेके पश्चात् उन्हें भगवान्का आदेश प्राप्त हुआ। स्वयं भगवान् नारायणने महालक्ष्मीके दिव्य विग्रहसे मर्त्यलक्ष्मीको प्रकट किया और 'दक्षिणा' नाम रखकर उसे ब्रह्माजीको सौंप दिया। ब्रह्माजीने यज्ञसम्बन्धी समस्त कार्योंकी सम्पन्नताके लिये देवी दक्षिणाको यज्ञपुरुषके हाथमें दे दिया। उस समय यज्ञपुरुषका मन आनन्दसे भर गया। उन्होंने भगवती दक्षिणाकी विधिवत् पूजा और स्तुति की। उन देवीका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान था। प्रभा ऐसी थी, मानो करोड़ों चन्द्रमा हों। वे अत्यन्त कमनीया, सुन्दरी तथा परम मनोहारिणी थीं। कमलके समान मुखवाली वे कोमलाङ्गी देवी कमल-जैसे विशाल नेत्रोंसे शोभा पा रही थीं। भगवती लक्ष्मीसे प्रकट उन आदरणीया देवीके लिये कमल ही आसन भी था। अग्निशुद्ध वस्त्र उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। उन साध्वीका ओठ सुपक्व बिम्बाफलके सदृश था। उनकी दन्तावली बड़ी सुन्दर थी। उन्होंने अपने केशकलापमें मालतीके पुष्पोंकी माला धारण कर रखी थी। उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कान छायी थी। वे रत्ननिर्मित भूषणोंसे विभूषित थीं। उनका सुन्दर वेष था। उन्हें देखकर मुनियोंका मन भी मुग्ध हो जाता था। कस्तूरीमिश्रित चन्दनसे बिन्दीके रूपमें अर्द्धचन्द्राकार तिलक उनके ललाटपर शोभा पा रहा था। केशोंके नीचेका भाग (सीमन्त) सिन्दूरकी बेंदीसे अत्यन्त उद्दीप्त जान पड़ता था। सुन्दर नितम्ब, बृहत् श्रोणी और विशाल वक्षःस्थलसे वे शोभा पा रही थीं। फिर ब्रह्माजीके कथनानुसार यज्ञपुरुषने उन देवीको अपनी सहधर्मिणी बना लिया। कुछ समय बाद देवी दक्षिणा गर्भवती हो गयीं। बारह दिव्य वर्षोंके बाद उन्होंने सर्वकर्मफल नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न किया। वही कर्मफलोंका दाता है। कर्मपरायण सत्पुरुषोंको दक्षिणा फल देती है तथा कर्म पूर्ण होनेपर उनका पुत्र ही फलदायक होता है। अतएव वेदज्ञ पुरुष इस प्रकार कहते हैं कि भगवान् यज्ञ देवी दक्षिणा तथा अपने पुत्र 'फल' के साथ होनेपर ही कर्मोंका फल प्रदान करते हैं।
नारद! इस प्रकार यज्ञपुरुष दक्षिणा तथा फलदाता पुत्रको प्राप्त करके सबको कर्मोंका फल प्रदान करने लगे। तब देवताओंके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सभी सफलमनोरथ होकर अपने-अपने स्थानपर चले गये। मैंने धर्मदेवके मुखसे ऐसा सुना है। अतएव मुने! कर्ताको चाहिये कि कर्म करनेके पश्चात् तुरंत दक्षिणा दे दें। तभी सद्यः फल प्राप्त होता है—यह वेदोंकी स्पष्ट वाणी है। यदि दैववश अथवा अज्ञानसे यज्ञकर्ता कर्मसम्पन्न हो जानेपर तुरंत ही ब्राह्मणोंको दक्षिणा नहीं दे देता तो उस दक्षिणाकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती चली जाती है और साथ ही यजमानका सम्पूर्ण कर्म भी निष्फल हो जाता है। ब्राह्मणका स्वत्व अपहरण करनेसे वह अपवित्र मानव किसी कर्मका अधिकारी नहीं रह जाता। उसी पापके फलस्वरूप उस पातकी मानवको दरिद्र और रोगी होना पड़ता है। लक्ष्मी अत्यन्त भयंकर शाप देकर उसके घरसे चली जाती हैं। उसके दिये हुए श्राद्ध और तर्पणको पितर ग्रहण नहीं करते हैं। ऐसे ही, देवता उसकी की हुई पूजा तथा अग्निमें दी हुई आहुति भी स्वीकार नहीं करते। यज्ञ करते समय कतनि दक्षिणा संकल्प कर दी; किंतु दी नहीं और प्रतिग्रह लेनेवालेने उसे माँगा भी नहीं तो ये दोनों व्यक्ति नरकमें इस प्रकार गिरते हैं, जैसे रस्सी टूट जानेपर घड़ा। विप्र! इस प्रकारकी यह रहस्यभरी बातें बतला दीं। तुम्हें पुनः क्या सुननेकी इच्छा है?