भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रकृतिखण्ड २५३


यह स्तोत्र तो कह दिया, अब ध्यान और पूजा-विधि सुनो। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि शालग्रामकी मूर्तिमें अथवा कलशपर आवाहन करके भगवती दक्षिणाकी पूजा करे। ध्यान यों करना चाहिये—'भगवती लक्ष्मीके दाहिने कंधेसे प्रकट होनेके कारण दक्षिणा नामसे विख्यात ये देवी साक्षात् कमलाकी कला हैं। सम्पूर्ण यज्ञ-यागादि कर्मोंमें अखिल कर्मोंका फल प्रदान करना इनका सहज गुण है। ये भगवान् विष्णुकी शक्तिस्वरूपा हैं। मैं इनकी आराधना करता हूँ। ऐसी शुभा, शुद्धिदा, शुद्धिरूपा एवं सुशीला नामसे प्रसिद्ध भगवती दक्षिणाकी मैं उपासना करता हूँ।' नारद! इसी मन्त्रसे ध्यान करके विद्वान् पुरुष मूलमन्त्रसे इन वरदायिनी देवीकी पूजा करे। पाद्य, अर्घ्य आदि सभी इसी वेदोक्त मन्त्रके द्वारा अर्पण करने चाहिये। मन्त्र यह है—'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं दक्षिणायै स्वाहा।' सुधीजनोंको चाहिये कि सर्वपूजिता इन भगवती दक्षिणाकी अर्चना भक्तिपूर्वक उत्तम विधिके साथ करें।

ब्रह्मन्! इस प्रकार भगवती दक्षिणाका उपाख्यान कह दिया। यह उपाख्यान सुख, प्रीति एवं सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्रदान करनेवाला है। जो पुरुष देवी दक्षिणाके इस चरित्रका सावधान होकर श्रवण करता है, भारतकी भूमिपर किये गये उसके कोई कर्म अङ्गहीन नहीं होते। इसके श्रवणसे पुत्रहीन पुरुष अवश्य ही गुणवान् पुत्र प्राप्त कर लेता है और जो भार्याहीन हो, उसे परम सुशीला सुन्दरी पत्नी सुलभ हो जाती है। वह पत्नी विनीत, प्रियवादिनी एवं पुत्रवती होती है। पतिव्रता, उत्तम व्रतका पालन करनेवाली, शुद्ध आचार-विचार रखनेवाली तथा श्रेष्ठ कुलकी कन्या होती है। विद्याहीन विद्या, धनहीन धन, भूमिहीन भूमि तथा प्रजाहीन मनुष्य श्रवणके प्रभावसे प्रजा प्राप्त कर लेता है। संकट, बन्धुविच्छेद, विपत्ति तथा बन्धनके कष्टमें पड़ा हुआ पुरुष एक महीनेतक इसका श्रवण करके इन सबसे छूट जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

(अध्याय ४२)


देवी षष्ठीके ध्यान, पूजन, स्तोत्र तथा विशद महिमाका वर्णन

नारदजीने कहा—प्रभो! भगवती 'षष्ठी', मङ्गलचण्डिका तथा देवी मनसा—ये देवियाँ मूलप्रकृतिकी कला मानी गयी हैं। मैं अब इनके प्राकट्यका प्रसङ्ग यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ।

भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! मूलप्रकृतिके छठे अंशसे प्रकट होनेके कारण ये 'षष्ठी' देवी कहलाती हैं। बालकोंकी ये अधिष्ठात्री देवी हैं। इन्हें 'विष्णुमाया' और 'बालदा' भी कहा जाता है। मातृकाओंमें 'देवसेना' नामसे ये प्रसिद्ध हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली इन साध्वी देवीको स्वामी कार्तिकेयकी पत्नी होनेका सौभाग्य प्राप्त है। वे प्राणोंसे भी बढ़कर इनसे प्रेम करते हैं। बालकोंको दीर्घायु बनाना तथा उनका भरण-पोषण एवं रक्षण करना इनका स्वाभाविक गुण है। ये सिद्धियोगिनी देवी अपने योगके प्रभावसे बच्चोंके पास सदा विराजमान रहती हैं। ब्रह्मन्! इनकी पूजा-विधिके साथ ही यह एक उत्तम इतिहास सुनो। पुत्र प्रदान करनेवाला यह परम सुखदायी उपाख्यान धर्मदेवके मुखसे मैंने सुना है।

प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो चुके हैं। उनके पिताका नाम था—स्वायम्भुव मनु। प्रियव्रत योगिराज होनेके कारण विवाह करना नहीं चाहते थे। तपस्यामें उनकी विशेष रुचि