भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 270
२६०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अक्षर हैं। इसका वर्णन वेदमें है। यह भक्तोंके मनोरथको पूर्ण करनेवाला है। मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं मनसादेव्यै स्वाहा।’ पाँच लाख मन्त्र जप करनेपर यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जिसे इस मन्त्रकी सिद्धि प्राप्त हो गयी, वह धरातलपर सिद्ध है। उसके लिये विष भी अमृतके समान हो जाता है। उस पुरुषकी धन्वन्तरिसे तुलना की जा सकती है।

ब्रह्मन्! जो पुरुष आषाढ़की संक्रान्तिके दिन ‘गुडा’ (कपास या सेंहुड़) नामक वृक्षकी शाखापर यत्नपूर्वक इन भगवती मनसाका आवाहन करके भक्तिभावके साथ पूजा करता है तथा मनसापञ्चमीको उन देवीके लिये बलि अर्पण करता है, वह अवश्य ही धनवान्, पुत्रवान् और कीर्तिमान् होता है। महाभाग! पूजाका विधान कह चुका। अब धर्मदेवके मुखसे जैसा कुछ सुना है, वह उपाख्यान कहता हूँ, सुनो।

प्राचीन समयकी बात है। भूमण्डलके सभी मानव नागोंके भयसे आक्रान्त हो गये थे। नाग जिन्हें काट खाते, वे जीवित नहीं बचते थे। यह देख-सुनकर कश्यपजी भी भयभीत हो गये; अतः ब्रह्माजीके अनुरोधसे उन्होंने सर्पभयनिवारक मन्त्रोंकी रचना की। ब्रह्माजीके उपदेशसे वेदबीजके अनुसार मन्त्रोंकी रचना हुई। साथ ही ब्रह्माजीने अपने मनसे उत्पन्न करके इन देवीको इस मन्त्रकी अधिष्ठात्री देवी बना दिया। तपस्या तथा मनसे प्रकट होनेके कारण ये देवी ‘मनसा’ नामसे विख्यात हुईं। कुमारी अवस्थामें ही ये भगवान् शंकरके धाममें चली गयीं। कैलासमें पहुँचकर इन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान् चन्द्रशेखरकी पूजा करके उनकी स्तुति की। मुनिकुमारी मनसाने देवताओंके वर्षसे हजार वर्षोंतक भगवान् शंकरकी उपासना की। तदनन्तर भगवान् आशुतोष इनपर प्रसन्न हो गये। मुने! भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर इन्हें महान् ज्ञान प्रदान किया। सामवेदका अध्ययन कराया और भगवान् श्रीकृष्णके कल्पवृक्षरूप अष्टाक्षर-मन्त्रका उपदेश किया।

मन्त्रका रूप ऐसा है—लक्ष्मीबीज, मायाबीज और कामबीजका पूर्वमें प्रयोग करके कृष्ण शब्दके अन्तमें ‘ङे’ विभक्ति लगाकर ‘नमः’ पद जोड़ दिया जाता है (‘श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय नमः’)। भगवान् शंकरकी कृपासे जब मुनिकुमारी मनसाको उक्त मन्त्रके साथ त्रैलोक्यमङ्गल नामक कवच, पूजनका क्रम, सर्वमान्य स्तवन, भुवनपावन ध्यान, सर्वसम्मत वेदोक्त पुरश्चरणका नियम तथा मृत्युञ्जय-ज्ञान प्राप्त हो गया, तब वह साध्वी उनसे आज्ञा ले पुष्करक्षेत्रमें तपस्या करनेके लिये चली गयी। वहाँ जाकर उसने परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी तीन युगोंतक उपासना की। इसके बाद उसे तपस्यामें सिद्धि प्राप्त हुई। भगवान् श्रीकृष्णने सामने प्रकट होकर उसे दर्शन दिये। उस समय कृपानिधि श्रीकृष्णने उस कृशाङ्गी बालापर अपनी कृपाकी दृष्टि डाली। उन्होंने उसका दूसरोंसे पूजन कराया और स्वयं भी उसकी पूजा की; साथ ही वर दिया कि ‘देवि! तुम जगत्में पूजा प्राप्त करो।’ इस प्रकार कल्याणी मनसाको वर प्रदान करके भगवान् अन्तर्धान हो गये।

इस तरह इस मनसादेवीकी सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्णने पूजा की। तत्पश्चात् शंकर, कश्यप, देवता, मुनि, मनु, नाग एवं मानव आदिसे त्रिलोकीमें श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाली यह देवी सुपूजित हुई। फिर कश्यपजीने जरत्कारु मुनिके साथ उसका विवाह कर दिया। वे मुनि महान् योगी थे। विवाह करनेके पश्चात् तपस्या करनेमें संलग्न हो गये। वे एक दिन पुष्करक्षेत्रमें उस वटवृक्षके नीचे देवी जरत्कारुकी जाँघपर लेट गये और उन्हें नींद आ गयी। इतनेमें सायंकाल होनेको आया। सूर्यनारायण अस्ताचलको जाने लगे। देवी मनसा परम साध्वी एवं पतिव्रता थी। उसने मनमें विचार किया—‘द्विजोंके लिये