ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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देवी मनसाने अपने पुत्रके साथ पिता कश्यपजीके आश्रममें दीर्घकालतक वास किया। भ्रातृवर्ग सदा उनका पूजन, अभिवादन और सम्मान करता था। ब्रह्मन्! तदनन्तर एक बार गोलोकसे सुरभी गौ आयी और उसने अपने दूधसे आदरणीया मनसाको स्नान कराकर सादर उनका पूजन किया। साथ ही, उसने सर्वदुर्लभ गोप्य ज्ञानका भी उपदेश दिया। उस समय सुरभी देवताओंसे पूजित हो स्वर्गलोकमें चली गयी।
यह स्तोत्र पुण्यबीज कहलाता है। जो पुरुष मनसादेवीकी पूजा करके इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशके लिये भी नागसे भय नहीं हो सकता। यदि यह स्तोत्र सिद्ध हो जाय तो पुरुषके लिये विष भी अमृत-तुल्य हो जाता है। इस स्तोत्रका पाँच लाख जप करनेपर यह सिद्ध हो जाता है। फिर मन्त्रसिद्ध पुरुष सर्पशायी तथा सर्पवाहन हो सकता है अर्थात् उसपर सर्पका कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। (अध्याय ४४—४६)
आदिगौ सुरभीदेवीका उपाख्यान
नारदजीने पूछा— ब्रह्मन्! वह सुरभीदेवी कौन थी, जो गोलोकसे आयी थी? मैं उसके जन्म और चरित्र सुनना चाहता हूँ।
भगवान् नारायण बोले— नारद! देवी सुरभी गोलोकमें प्रकट हुई। वह गौओंकी अधिष्ठात्री देवी, गौओंकी आदि, गौओंकी जननी तथा सम्पूर्ण गौओंमें प्रमुख है। मुने! मैं सबसे पहली सृष्टिका प्रसङ्ग सुना रहा हूँ, जिसके अनुसार पूर्वकालमें वृन्दावनमें उस सुरभीका ही जन्म हुआ था।
एक समयकी बात है। गोपाङ्गनाओंसे घिरे हुए राधापति भगवान् श्रीकृष्ण कौतूहलवश श्रीराधाके साथ पुण्य-वृन्दावनमें गये। वहाँ वे विहार करने लगे। उस समय कौतुकवश उन
अहं करोमि त्वां पूज्यां प्रीतिश्च वर्धते मम। नित्यं यद्यपि त्वं पूज्या भवेऽत्र जगदम्बिके॥
तथापि तव पूजां च वर्धयामि च सर्वतः। ये त्वामाषाढसंक्रान्त्यां पूजयिष्यन्ति भक्तितः॥
पञ्चम्यां मनसाख्यायामिषान्तं वा दिने दिने। पुत्रपौत्रादयस्तेषां वर्धन्ते च धनानि वै॥
यशस्विनः कीर्तिमन्तो विद्यावन्तो गुणान्विताः। ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दन्त्यज्ञानतो जनाः।
लक्ष्मीहीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा। त्वं स्वर्गलक्ष्मीः स्वर्गे च वैकुण्ठे कमलाकला॥
नारायणांशो भगवान् जरत्कारुर्मुनीश्वरः। तपसा तेजसा त्वां च मनसा ससृजे पिता॥
अस्माकं रक्षणायैव तेन त्वं मनसाभिधा। मनसा देवितुं शक्ता स्वात्मना सिद्धयोगिनी॥
तेन त्वं मनसादेवी पूजिता वन्दिता भवे। ये भक्त्या मनसां देवाः पूजयन्त्यनिशं भृशम्॥
तेन त्वां मनसादेवीं प्रवदन्ति मनीषिणः। सत्यस्वरूपा देवी त्वं शश्वत्सत्त्वनिषेवया॥
यो हि यद् भावयेन्नित्यं शतं प्राप्नोति तत्समम्। इन्द्रश्च मनसां स्तुत्वा गृहीत्वा भगिनीं च ताम्॥
प्रजगाम स्वभवनं भूषावासपरिच्छदाम्। (प्रकृतिखण्ड ४६। १२८—१४१ १/२)