भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


ग्रीष्म-ऋतुके सूर्यके समान दीप्तिमती थी। कण्ठमें प्रकाशित शुभ मुक्ताहार गङ्गाकी धवल धारके समान शोभा पा रहा था। रसिकशेखर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने मन्द-मन्द मुस्कराती हुई अपनी उन प्रियतमाको देखा। प्राणवल्लभापर दृष्टि पड़ते ही विश्वकान्त श्रीकृष्ण मिलनके लिये उत्सुक हो गये। परम मनोहर कान्तिवाले प्राणवल्लभको देखते ही श्रीराधा उनके सामने दौड़ी गयीं। महेश्वरि! उन्होंने अपने प्राणारामकी ओर धावन किया, इसीलिये पुराणवेत्ता महापुरुषोंने उनका 'राधा' यह सार्थक नाम निश्चित किया। राधा श्रीकृष्णकी आराधना करती हैं और श्रीकृष्ण श्रीराधाकी। वे दोनों परस्पर आराध्य और आराधक हैं। संतोंका कथन है कि उनमें सभी दृष्टियोंसे पूर्णतः समता है।$^१$ महेश्वरि! मेरे ईश्वर श्रीकृष्ण रासमें प्रियाजीके धावनकर्मका स्मरण करते हैं, इसीलिये वे उन्हें 'राधा' कहते हैं, ऐसा मेरा अनुमान है। दुर्गे! भक्त पुरुष 'रा' शब्दके उच्चारणमात्रसे परम दुर्लभ मुक्तिको पा लेता है और 'धा' शब्दके उच्चारणसे वह निश्चय ही श्रीहरिके चरणोंमें दौड़कर पहुँच जाता है। 'रा' का अर्थ है 'पाना' और 'धा' का अर्थ है 'निर्वाण' (मोक्ष)। भक्तजन उनसे निर्वाण-मुक्ति पाता है, इसलिये उन्हें 'राधा' कहा गया है। श्रीराधाके रोमकूपोंसे गोपियोंका समुदाय प्रकट हुआ है तथा श्रीकृष्णके रोमकूपोंसे सम्पूर्ण गोपोंका प्रादुर्भाव हुआ है। श्रीराधाके वामांश-भागसे महालक्ष्मीका प्राकट्य हुआ है। वे ही शस्यकी अधिष्ठात्री देवी तथा गृहलक्ष्मीके रूपमें भी आविर्भूत हुई हैं। देवी महालक्ष्मी चतुर्भुज विष्णुकी पत्नी हैं और वैकुण्ठधाममें वास करती हैं। राजाको सम्पत्ति देनेवाली राजलक्ष्मी भी उन्हींकी अंशभूता हैं। राजलक्ष्मीकी अंशभूता मर्त्यलक्ष्मी हैं, जो गृहस्थोंके घर-घरमें वास करती हैं। वे ही शस्याधिष्ठातृदेवी तथा वे ही गृहदेवी हैं। स्वयं श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्रियतमा हैं तथा श्रीकृष्णके ही वक्षःस्थलमें वास करती हैं। वे उन परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं।$^२$

पार्वति! ब्रह्मासे लेकर तृण अथवा कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् मिथ्या ही है। केवल त्रिगुणातीत परब्रह्म परमात्मा श्रीराधावल्लभ श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं; अतः तुम उन्हींकी आराधना करो।$^३$ वे सबसे प्रधान, परमात्मा, परमेश्वर, सबके आदिकारण, सर्वपूज्य, निरीह तथा प्रकृतिसे परे विराजमान हैं। उनका नित्यरूप स्वेच्छामय है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही शरीर धारण करते हैं। श्रीकृष्णसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे देवता हैं; उनका रूप प्राकृत तत्त्वोंसे ही गठित है। श्रीराधा श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। वे परम सौभाग्यशालिनी हैं। वे मूलप्रकृति परमेश्वरी श्रीराधा महाविष्णुकी जननी हैं। संत पुरुष मानिनी राधाका सदा सेवन करते हैं। उनका चरणारविन्द ब्रह्मादि देवताओंके लिये परम दुर्लभ होनेपर भी भक्तजनोंके लिये सदा सुलभ है। सुदामाके शापसे देवी श्रीराधाको गोलोकसे इस भूतलपर आना पड़ा था। उस समय वे वृषभानु गोपके घरमें अवतीर्ण हुई थीं। वहाँ उनकी माता कलावती थीं। (अध्याय ४८)


१. राधा भजति श्रीकृष्णं स च तां च परस्परम्। उभयोः सर्वसाम्यं च सदा सन्तो वदन्ति च॥
(प्रकृतिखण्ड ४८।३८)
२. प्राणाधिष्ठातृदेवी च तस्यैव परमात्मनः॥ (प्रकृतिखण्ड ४८।४७)
३. आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सर्वं मिथ्यैव पार्वति । भज सत्यं परं ब्रह्म राधेशं त्रिगुणात्परम्॥
(प्रकृतिखण्ड ४८।४८)