ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २८५ ब्रह्मपुत्र आदि सब लोग ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। दैनन्दिन प्रलय व्यतीत होनेपर ब्रह्माजी पुनः लोकोंकी सृष्टि आरम्भ करते हैं। इस प्रकार सौ वर्षोंतक ब्रह्माकी आयु पूरी होती है। तदनन्तर ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर एक कल्प पूरा हो जाता है। उस समय जो 'महाप्रलय' आता है, उसीको पुरातन महर्षियोंने 'महारात्रि' कहा है। ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर ब्रह्माण्डसमूह जलमें डूब जाता है। वेदमाता सावित्री, वेद और धर्म आदि सब-के-सब तिरोहित हो जाते हैं। मृत्युका भी विनाश हो जाता है। परंतु देवी प्रकृति और भगवान् शिवका नाश नहीं होता। विश्वके वैष्णवगण भगवान् नारायणमें लीन हो जाते हैं। संहारकारी कालाग्निरुद्र समस्त रुद्रगणोंके साथ मृत्युञ्जय महादेवमें लीन हो जाते हैं। उनके साथ ही तमोगुणका भी लय हो जाता है। तदनन्तर प्रकृतिकी एक पलक गिरती है। साथ ही नारायण, शिव तथा महाविष्णुकी भी पलक गिरती है। नरेश्वर ! निमेषके अन्तमें अर्थात् पलक उठनेपर श्रीकृष्णकी इच्छासे पुनः सृष्टिका आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण निमेषसे रहित हैं। उनकी पलक नहीं गिरती है; क्योंकि वे प्रकृतिसे परे तथा प्राकृत गुणोंसे रहित हैं। जो सगुण हैं, उन्हींके निमेष होता है। वह निमेष काल- संख्यात्मक अवस्थासे सीमित होता है। जो नित्य, निर्गुण, अनादि और अनन्त हैं, उनके निमेष कहाँ? जब प्रकृतिकी एक सहस्र बार पलकें गिर जाती हैं, तब उसका एक दण्ड पूरा होता है। ऐसे साठ दण्डोंका उसका एक दिन कहा गया है। तीस दिनोंका एक मास और बारह महीनोंका वर्ष होता है। ऐसे एक सौ वर्ष बीत जानेपर प्रकृतिका श्रीकृष्णमें लय होता है। श्रीकृष्णमें उसके लय होनेपर जो प्रलय होता है, उसे 'प्राकृत प्रलय' कहा गया है। महाविष्णुकी जननी वह एकमात्र मूलप्रकृति ईश्वरी सबका संहार करके स्वयं श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें विलीन हो जाती है। संतपुरुष उसीको सनातनी विष्णुमाया, सर्वशक्तिस्वरूपा दुर्गा, सती नारायणी, श्रीकृष्णकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी तथा निर्गुणात्मिका कहते हैं। जिसकी मायासे बड़े-बड़े देवता मोहित होते हैं, उस देवीको वैष्णवजन महालक्ष्मी तथा 'परा राधा' कहते हैं। श्रीकृष्णके आधे अङ्गसे प्रकट हुई महालक्ष्मी नारायणकी प्रिया है। वही राधारूपसे श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी और उनकी प्राणाधिका है। शश्वत् प्रेममयी शक्ति है। निर्गुण परमात्माकी निर्गुणा प्रियतमा है। नारायण और शिव दोनों शुद्ध-सत्त्वस्वरूपी हैं। वे अपने बहुत-से पार्षदगणोंका अपने-आपमें संहार करके निर्गुण श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। नरेश्वर ! गोप, गोपियाँ और सवत्सा गौएँ सब- की-सब प्रकृतिस्वरूपा श्रीराधामें लीन हो जाती हैं और वे प्रकृतिदेवी परमेश्वर श्रीकृष्णमें। जो क्षुद्र विष्णु हैं, वे सब महाविष्णुमें लीन होते हैं। महाविष्णु प्रकृतिमें और वह श्रीकृष्णकी मूल- प्रकृति परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन होती है। माया तथा ईश्वरकी इच्छासे प्रकृतिने योगनिद्रा बनकर श्रीकृष्णके नेत्रकमलोंमें निवास किया। जितने समयमें प्रकृतिका एक दिन होता है, उतने समयतक वृन्दावनमें परमात्मा श्रीकृष्णको नींद लगी रहती है। वहाँ बहुमूल्य रत्नोंका पर्यङ्क बिछा होता है, जो अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्रोंसे आच्छादित होता है। गन्ध, चन्दन और फूलोंकी वायुसे वह पर्यङ्क सुवासित रहता है। उसीपर श्यामसुन्दर शयन करते हैं। उनके पुनः जागनेपर सारी सृष्टिका कार्य आरम्भ होता है। उन निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णका वन्दन, स्मरण, ध्यान, पूजन और गुण-कीर्तन महापातकोंका नाश करनेवाला है। महाराज ! मैंने मृत्युञ्जय महादेवके मुखसे जैसा सुना था और आगमोंमें जो कुछ कहा गया है, उसके अनुसार यह सब कुछ बता दिया। अब