ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३१० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् नश्वर ही है, केवल निर्गुण परब्रह्म श्रीकृष्ण ही नित्य सत्य हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिकी आदिजननी परात्परा प्रकृति मैं ही हूँ। मैं सगुणा, निर्गुणा, श्रेष्ठा, सदा स्वेच्छामयी, नित्यानित्या, सर्वरूपा, सर्वकारणकारणा और सबकी बीजरूपा मूलप्रकृति ईश्वरी हूँ। रमणीय गोलोकमें पुण्यमय वृन्दावनके भीतर रासमण्डलमें परमात्मा श्रीकृष्णकी प्राणाधिका राधा मैं ही हूँ। मैं ही दुर्गा, विष्णुमाया तथा बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हूँ। वैकुण्ठमें मैं ही लक्ष्मी और साक्षात् सरस्वती देवी हूँ। ब्रह्मलोकमें मुझे ही ब्रह्माणी तथा वेदमाता सावित्री कहते हैं। मैं ही गङ्गा, तुलसी तथा सबकी आधारभूता वसुन्धरा हूँ। नरेश्वर! मैंने अपनी कलासे नाना प्रकारके रूप धारण किये हैं। मायाद्वारा सम्पूर्ण स्त्रियोंके रूपमें मेरा ही प्रादुर्भाव हुआ है। परम पुरुष परमात्मा श्रीकृष्णने अपनी भ्रूभङ्गलीलासे मेरी सृष्टि की है। उन्हीं पुरुषोत्तमने अपनी भ्रूभङ्गलीलासे उस महान् विराट्की भी सृष्टि की है, जिसके रोमकूपोंमें सदैव असंख्य विश्व-ब्रह्माण्ड निवास करते हैं। वे सब-के-सब कृत्रिम हैं, तथापि मायासे सब लोग उन अनित्य लोकोंमें भी सदा नित्यबुद्धि करते हैं। सातों द्वीपों और समुद्रोंसे युक्त पृथ्वी, नीचेके सात पाताल और ऊपरके सात स्वर्ग—इन सबको मिलाकर एक विश्व-ब्रह्माण्ड कहा गया है, जिसकी रचना ब्रह्माद्वारा हुई है। इस तरहके जो असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, उन सबमें पृथक्-पृथक् ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि विद्यमान हैं। उन सबके ईश्वर श्रीकृष्ण हैं। यही परात्पर ज्ञान है। वेदों, व्रतों, तीर्थों, तपस्याओं, देवताओं और पुण्योंका जो सारतत्त्व है, वह श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण-भक्तिसे हीन जो मूढ़ मनुष्य है, वह निश्चय ही जीते-जी मृतकके समान है। श्रीकृष्ण-भक्तोंको छूकर बहनेवाली वायुका स्पर्श पाकर सारे तीर्थ पवित्र हो गये हैं। श्रीकृष्ण-मन्त्रोंका उपासक ही जीवन्मुक्त माना गया है। जप, तप, तीर्थ और पूजाके बिना केवल मन्त्रग्रहणमात्रसे नर नारायण हो जाता है। श्रीकृष्ण-भक्त अपने नाना और उनके ऊपरकी सौ पीढ़ियोंका तथा पितासे लेकर ऊपरकी एक सहस्र पीढ़ियोंका उद्धार करके गोलोकमें जाता है। नरेश्वर! यह सारभूत ज्ञान मैंने तुम्हें बताया है। सावर्णिक मन्वन्तरके अन्तमें जब तुम्हारे सारे दोष समाप्त हो जायँगे, उस समय मैं तुम्हें श्रीहरिकी भक्ति प्रदान करूँगी।
कर्मोंका फल भोगे बिना उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी क्षय नहीं होता है। अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है।* मैं जिसपर अनुग्रह करती हूँ, उसे परमात्मा श्रीकृष्णके प्रति निर्मल, निश्चल एवं सुदृढ़ भक्ति प्रदान करती हूँ और जिन्हें ठगना चाहती हूँ; उन्हें प्रातःकालिक स्वप्नके समान मिथ्या एवं भ्रमरूपिणी सम्पत्ति प्रदान करती हूँ। बेटा! मैंने तुम्हें यह ज्ञानकी बात बतायी है। अब तुम सुखपूर्वक जाओ।
ऐसा कहकर महादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। राज्यप्राप्तिका वरदान पाकर राजा देवीको नमस्कार करके अपने घरको चले गये। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हें दुर्गाजीका परम उत्तम उपाख्यान सुनाया है। (अध्याय ६५)
* नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥
(प्रकृतिखण्ड ६५। ३९)