ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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पार्वतीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए श्रीकृष्णका पार्वतीको अपने रूपके दर्शन कराना, वर प्रदान करना और बालकरूपसे उनकी शय्यापर खेलना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! पार्वतीद्वारा किये गये उस स्तवनको सुनकर करुणानिधि श्रीकृष्णने पार्वतीको अपने उस स्वरूपके, जो सबके लिये अदृश्य और परम दुर्लभ है, दर्शन कराये। उस समय पार्वतीदेवी स्तुति करके अपने मनको एकमात्र श्रीकृष्णमें लगाकर ध्यानमें संलग्न थीं। उन्होंने उस तेजोराशिके मध्य सबको मोहित करनेवाले श्रीकृष्णके स्वरूपका दर्शन किया। वह एक रत्नपूर्ण मनोरम आसनपर, जो बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ था, जिसमें हीरे जड़े हुए थे और जो मणियोंकी मालाओंसे शोभित था, विराजमान था। उसके शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था, हाथमें वंशी शोभा दे रही थी। गलेमें वनमालाकी निराली छटा थी। शरीरका रंग श्याम था। रत्नोंके आभूषण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसकी किशोर-अवस्था तथा वेश-भूषा विचित्र थी। उसके ललाटपर चन्दनकी खौर लगी थी।
मुखपर मनोहर मुस्कान खेल रही थी। वह वन्दनीय स्वरूप शरद्-ऋतुके चन्द्रमाका उपहासक तथा मालतीकी मालाओंसे युक्त था। उसके मस्तकपर मयूरपिच्छकी अनोखी छवि थी। गोपाङ्गनाएँ उसे घेरे हुए थीं। वह राधाके वक्षःस्थलको उद्भासित कर रहा था, उसकी लावण्यता करोड़ों कामदेवोंको मात कर रही थी, वही लीलाका धाम, मनोहर, अत्यन्त प्रसन्न, सबका प्रेमपात्र और भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाला था। ऐसे उस रूपको देखकर सुन्दरी पार्वतीने मन-ही-मन उसीके अनुरूप पुत्रकी कामना की और उसी क्षण उन्हें वह वर प्राप्त भी हो गया। इस प्रकार वरदानी परमात्माने पार्वतीके मनमें जिस-जिस वस्तुकी कामना थी, उसे पूर्ण करके देवताओंका भी अभीष्ट सिद्ध किया। तत्पश्चात् यह तेज अन्तर्धान हो गया। तब देवताओंने कृपापरवश हो सनत्कुमारको समझाया और
द्विभुजं कमनीयं च किशोरं श्यामसुन्दरम्। शान्तं गोपाङ्गनाकान्तं रत्नभूषणभूषितम्॥
एवं तेजस्विनं भक्ताः सेवन्ते सततं मुदा। ध्यायन्ति योगिनो यत् तत् कुतस्तेजस्विनं विना॥
तत् तेजो बिभ्रतां देव देवानां तेजसा पुरा। आविर्भूतासुराणां च वधाय ब्रह्मणः स्तुता॥
नित्या तेजःस्वरूपांहं विधृत्य विग्रहं विभो। स्त्रीरूपं कमनीयं च विधाय समुपस्थिता॥
मायया तव मायाहं मोहयित्वासुरान् पुरा। निहत्य सर्वान् शैलेन्द्रमगमं तं हिमाचलम्॥
ततोऽहं संस्तुता देवैस्तारकाक्षेण पीडितैः। अभवं दक्षजायायां शिवस्त्री तत्र जन्मनि॥
त्यक्त्वा देहं दक्षयज्ञे शिवाहं शिवनिन्दया। अभवं शैलजायायां शैलाधीशस्य कर्मणा।
अनेकतपसा प्राप्तः शिवश्चात्रापि जन्मनि। पाणिं जग्राह मे योगी प्रार्थितो ब्रह्मणा विभुः॥
शृङ्गारजं च तत्तेजो नालभं देवमायया। स्तौमि त्वामेव तेनेश पुत्रदुःखेन दुःखिता॥
व्रते भवद्विधं पुत्रं लब्धुमिच्छामि साम्प्रतम्। देवेन विहिता वेदे साङ्गे स्वस्वामिदक्षिणा॥
श्रुत्वा सर्वं कृपासिन्धो कृपां मां कर्तुमर्हसि। इत्युक्त्वा पार्वती तत्र विरराम च नारद॥
भारते पार्वतीस्तोत्रं यः शृणोति सुसंयतः। सत्पुत्रं लभते नूनं विष्णुतुल्यपराक्रमम्॥
संवत्सरं हविष्याशी हरिमभ्यर्च्य भक्तितः। सुपुण्यकव्रतफलं लभते नात्र संशयः॥
विष्णुस्तोत्रमिदं ब्रह्मन् सर्वसम्पत्तिवर्धनम्। सुखदं मोक्षदं सारं स्वामिसौभाग्यवर्धनम्॥
सर्वसौन्दर्यबीजं च यशोराशिविवर्धनम्। हरिभक्तिप्रदं तत्त्वज्ञानबुद्धिविवर्धनम्॥
(गणपतिखण्ड ७।१०९–१३१)