ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
विशालाक्ष, शंकुकर्ण, कबन्ध, नन्दीश्वर, महाकाल, वज्रदन्त, भगन्दर, गोधामुख, दधिमुख आदि दूतोंको, जो धधकती हुई आगकी लपटके समान उद्दीप्त हो रहे थे, भेजा। उन सभी शिव-दूतोंने, जो नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित थे, शीघ्र ही जाकर कृत्तिकाओंके भवनको चारों ओरसे घेर लिया। उन्हें देखकर सभी कृत्तिकाओंका मन भयसे व्याकुल हो गया। तब वे ब्रह्मतेजसे उद्दीप्त होते हुए कार्तिकेयके पास जाकर कहने लगीं।
कृत्तिकाओंने कहा— बेटा कार्तिकेय! असंख्यों कराल सेनाओंने भवनको चारों ओरसे घेर लिया है और हमें पता भी नहीं है कि ये किसकी हैं।
तब कार्तिकेय बोले— माताओ! आपलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये। मेरे रहते आपको भय कैसा? यह कर्मभोग दुर्निवार्य है, इसे कौन हटा सकता है। इसी बीच सेनापति नन्दिकेश्वर भी वहाँ कार्तिकेयके समक्ष उपस्थित हुए और कृत्तिकाओंसे बोले।
नन्दिकेश्वरने कहा— भ्राता! संहारकर्ता सुरश्रेष्ठ शंकर और माता पार्वतीद्वारा भेजे गये शुभ समाचारको मुझसे श्रवण करो। कैलासपर्वतपर गणेशके माङ्गलिक जन्मोत्सवके अवसरपर सभामें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवता उपस्थित हैं। वहाँ गिरिराजकिशोरीने जगत्का पालन करनेवाले विष्णुको सम्बोधित करके उनसे तुम्हारे अन्वेषणके लिये कहा। तब विष्णुने तुम्हारी प्राप्तिके निमित्त क्रमशः उन सभी देवोंसे पूछा। उनमेंसे प्रत्येकने यथोचित उत्तर भी दिया। उन्हींमें धर्म-अधर्मके साक्षी धर्म आदि सभी देवताओंने परमेश्वरको तुम्हारे यहाँ कृत्तिकाओंके भवनमें रहनेकी सूचना दी। प्राचीनकालमें शिव- पार्वतीकी जो एकान्त क्रीड़ा हुई थी, उसमें देवताओंद्वारा देखे जानेपर शम्भुका शुक्र भूतलपर गिर पड़ा था। भूमिने उस शुक्रको अग्निमें और अग्निने उसे सरकंडोंके वनमें फेंक दिया। वहाँसे इन कृत्तिकाओंने तुम्हें पाया है। अब तुम अपने घर चलो। वहाँ तुम्हें सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंकी प्राप्ति होगी, विष्णु देवताओंको साथ लेकर तुम्हारा अभिषेक करेंगे और तब तुम तारकासुरका वध करोगे। तुम विश्वसंहर्ता शंकरके पुत्र हो, अतः ये कृत्तिकाएँ तुम्हें उसी तरह नहीं छिपा सकतीं, जैसे शुष्क वृक्ष अपने कोटरमें अग्निको गुप्त नहीं रख सकता। तुम तो विश्वमें दीप्तिमान् हो। इन कृत्तिकाओंके घरमें तुम्हारी उसी प्रकार शोभा नहीं हो रही है, जैसे महाकूपमें पड़े हुए चन्द्रमा शोभित नहीं होते। जैसे सूर्य मनुष्यके हाथोंकी ओटमें नहीं छिप सकते, उसी तरह तुम भी इनके अङ्गतेजसे आच्छादित न होकर जगत्को प्रकाशित कर रहे हो। शम्भुनन्दन! तुम तो जगद्व्यापी विष्णु हो, अतः इन कृत्तिकाओंके व्याप्य नहीं हो, जैसे आकाश किसीका व्याप्य नहीं है, बल्कि वह स्वयं ही सबका व्यापक है। तुम विषयोंसे निर्लिप्त योगीन्द्र हो तथा विश्वके आधार और परमेश्वर हो। ऐसी दशामें कृत्तिकाओंके भवनमें तुम सर्वेश्वरका निवास होना उसी प्रकार सम्भव नहीं है, जैसे क्षुद्र गौरैयाके उदरमें गरुड़का रहना असम्भव है। तुम भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह तथा गुणों और तेजोंकी राशि हो। देवगण तुम्हें उसी तरह नहीं जानते जैसे योगहीन पुरुष ज्ञानसे अनभिज्ञ होता है। जैसे मोहितचित्तवाले भक्तिहीन मनुष्योंको हरिकी उत्कृष्ट भक्तिका ज्ञान नहीं होता, उसी तरह ये कृत्तिकाएँ तुम्हें कैसे जान सकती हैं; क्योंकि तुम अनिर्वचनीय हो। भ्राता! जो लोग जिसके गुणको नहीं जानते, वे उसका अनादर ही करते हैं; जैसे मेढक एक साथ रहनेवाले कमलोंका आदर नहीं करते।
कार्तिकेयने कहा— भ्राता! जो भूत, भविष्यत्, वर्तमान—तीनों कालोंका ज्ञान है, वह सब मुझे ज्ञात है। तुम भी तो ज्ञानी हो; क्योंकि मृत्युञ्जयके आश्रित हो। ऐसी दशामें तुम्हारी क्या प्रशंसा की