ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड ३६७
निषेकजन्य (प्रारब्धजन्य) कर्म सत्य (अटल) होता है। भला, कर्मफलभोगको कौन हटा सकता है ? वत्स ! श्रीकृष्णने जिस प्रकारके भूत, वर्तमान और भविष्यकी रचना की है, उनके द्वारा निरूपित उस कर्मको कौन निवारण कर सकता है ? बेटा ! मायाका कारण, मायावियोंके पाञ्चभौतिक शरीर और संकेतपूर्वक नाम—ये प्रातःकालके स्वप्नसदृश निरर्थक हैं। परमात्माके अंशभूत आत्माके चले जानेपर भूख, निद्रा, दया, शान्ति, क्षमा, कान्ति, प्राण, मन तथा ज्ञान सभी चले जाते हैं। जैसे राजाधिराजके पीछे नौकर-चाकर चलते हैं, उसी प्रकार बुद्धि तथा सारी शक्तियाँ उसीका अनुगमन करती हैं; अतः तुम यत्नपूर्वक श्रीकृष्णका भजन करो। बेटा ! कौन किसके पितर हैं और कौन किसके पुत्र हैं। ये सभी इस दुस्तर भवसागरमें कर्मरूपी लहरियोंसे प्रेरित हो रहे हैं। पुत्र ! ज्ञानीलोग विलाप नहीं करते, अतः अब तुम भी रुदन मत करो; क्योंकि रोनेके कारण आँसुओंके गिरनेसे मृतकोंको निश्चय ही नरकमें जाना पड़ता है।* भाई-बन्धु आदि कुटुम्बके लोग जिस सांकेतिक नामका उच्चारण करके रुदन करते हैं, उसे वे सौ वर्षोंतक रोते रहनेपर भी नहीं पा सकते—यह निश्चित है; क्योंकि त्वचा आदि पृथ्वीके अंशको पृथ्वी, जलांशको जल, शून्यांशको आकाश, वायुके अंशको वायु तथा तेजांशको तेज ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार सभी अंश अपने-अपने अंशीमें विलीन हो जाते हैं; फिर रोनेसे कौन वापस आयेगा। मरनेके बाद तो नाम, शास्त्र, ज्ञान, यश और कर्मकी कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। इसलिये जो वेदविहित पारलौकिक कर्म है, इस समय तुम वही करो; क्योंकि जो परलोकके लिये हितकारी हो, वही वास्तवमें पुत्र है और वही बन्धु है। भृगुके उस वचनको सुनकर महासाध्वी रेणुकाने उसी क्षण शोकका परित्याग कर दिया और मुनिसे कहना आरम्भ किया। (अध्याय २७)
रेणुका-भृगु-संवाद, रेणुकाका पतिके साथ सती होना, परशुरामका पिताकी अन्त्येष्टि क्रिया करके ब्रह्माके पास जाना और अपनी प्रतिज्ञा सुनाना, ब्रह्माका उन्हें शिवजीके पास भेजना
रेणुकाने पूछा—ब्रह्मन् ! अब मैं अपने प्राणनाथका अनुगमन करना चाहती हूँ। दूसरोंको मान देनेवाले ये मेरे पतिदेव आज मेरे ऋतुकालके चौथे दिन मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! बतलाइये, अब इस विषयमें कैसी व्यवस्था करनी चाहिये। मेरे कई जन्मोंका पुण्य उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप सहसा उपस्थित हुए हैं।
भृगुने कहा—अहो महासति ! तुम अपने पुण्यात्मा पतिका अनुगमन करो; क्योंकि ऋतुका चौथा दिन पतिके सभी कार्योंमें शुद्ध माना जाता है। जो भक्तिदाता है, वही पुत्र है; जो अनुगमन करती है, वही स्त्री है; जो दान देता है, वही बन्धु है; जो गुरुकी अर्चना करता है, वही शिष्य है; जो रक्षा करे, वही अभीष्ट देवता है; जो प्रजाका पालन करे, वही राजा है; जो अपनी पत्नीकी बुद्धिको धर्ममें नियोजित करता है, वही स्वामी है; जो धर्मोपदेशक तथा हरिभक्ति प्रदान करनेवाला
* ज्ञानिनो मा रुदन्त्येव मा रोदीः पुत्र साम्प्रतम्। रोदनाश्रुप्रपतानामृतानां नरकं ध्रुवम्॥ (२७।६२)