भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 382
३७२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बड़े आदरके साथ सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् शिवजीके वामभागमें कार्तिकेय, दाहिनी ओर गणेश्वर, सामने नन्दीश्वर, महाकाल और वीरभद्र तथा उनकी गोदमें उनकी प्रियतमा पत्नी गिरिराजनन्दिनी गौरीको देखा। उन सबको भी परशुरामने बड़े हर्षके साथ भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर नमस्कार किया। उस समय शिवजीका दर्शन करके परशुराम परम संतुष्ट हुए। शोकसे पीड़ित तो वे थे ही; अतः आँखोंमें आँसू भरकर अत्यन्त कातर हो हाथ जोड़कर शान्तभावसे दीन एवं गद्गदवाणीके द्वारा शिवजीकी स्तुति करने लगे।

परशुराम बोले—ईश! मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ, परंतु स्तवन करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ। आप अक्षर और अक्षरके कारण तथा इच्छारहित हैं, तब मैं आपकी क्या स्तुति करूँ? मैं मन्दबुद्धि हूँ; मुझमें शब्दोंकी योजना करनेका ज्ञान तो है नहीं और चला हूँ देवेश्वरकी स्तुति करने। भला, जिनका स्तवन करनेकी शक्ति वेदोंमें नहीं है, उन आपकी स्तुति करके कौन पार पा सकता है? आप मन, बुद्धि और वाणीके अगोचर, सारसे भी साररूप, परात्पर, ज्ञान और बुद्धिसे असाध्य, सिद्ध, सिद्धोंद्वारा सेवित, आकाशकी तरह आदि, मध्य और अन्तसे हीन तथा अविनाशी, विश्वपर शासन करनेवाले, तन्त्ररहित, स्वतन्त्र, तन्त्रके कारण, ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, साधन करनेमें अत्यन्त सुगम और दयाके सागर हैं। दीनबन्धो! मैं अत्यन्त दीन हूँ। करुणासिन्धो! मेरी रक्षा कीजिये। आज मेरा जन्म सफल तथा जीवन सुजीवन हो गया; क्योंकि भक्तगण जिन्हें स्वप्नमें भी नहीं देख पाते, उन्हींको इस समय मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। जिनकी कलासे इन्द्र आदि देवगण तथा जिनके कलांशसे चराचर प्राणी उत्पन्न हुए हैं, उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, जल और वायुके रूपमें विराजमान हैं, उन महेश्वरको मैं अभिवादन करता हूँ। जो स्त्रीरूप, नपुंसकरूप और पुरुषरूप धारण करके जगत्‌का विस्तार करते हैं, जो सबके आधार और सर्वरूप हैं, उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। हिमालयकन्या देवी पार्वती ने कठोर तपस्या करके जिनको प्राप्त किया है। दीर्घ तपस्याके द्वारा भी जिनका प्राप्त होना दुर्लभ है; उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सबके लिये कल्पवृक्षरूप हैं और अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करते हैं, जो बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं और जो भक्तोंके बन्धु हैं; उन महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो लीलापूर्वक क्षणभरमें अनन्त विश्व-सृष्टियोंका संहार करनेवाले हैं; उन भयंकर रूपधारी महेश्वरको मेरा प्रणाम है। जो कालरूप, कालके काल, कालके कारण और कालसे उत्पन्न होनेवाले हैं तथा जो अजन्मा एवं बारंबार जन्म धारण करनेवाले आदि सब कुछ हैं; उन महेश्वरको मैं मस्तक झुकाता हूँ। यों कहकर भृगुवंशी परशुराम शंकरजीके चरण-कमलोंपर गिर पड़े। तब शिवजीने परम प्रसन्न होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिये। नारद! जो भक्तिभावसहित इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे पूर्णतया मुक्त होकर शिवलोकमें जाता है।*

(अध्याय २९)


* परशुराम उवाच—
ईश त्वां स्तोतुमिच्छामि सर्वथा स्तोतुमक्षमम्। अक्षराक्षरबीजं च किं वा स्तौमि निरीहकम्॥
न योजनां कर्तुमीशो देवेशं स्तौमि मूढधीः। वेदा न शक्ता यं स्तोतुं कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः॥
बुद्धेर्वाङ्मनसोः पारं सारात्सारं परात्परम्। ज्ञानबुद्धेरसाध्यं च सिद्धं सिद्धैर्निषेवितम्॥