ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 384, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
व्यास हो जायगी—इसमें संशय नहीं है।
नारद! इतना कहकर शंकरजीने परशुरामको परम दुर्लभ मन्त्र और ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक परम अद्भुत कवच प्रदान किया। फिर स्तोत्र, पूजाका विधान, पुरश्चरणपूर्वक मन्त्रसिद्धिका अनुष्ठान, नियमका ठीक-ठीक क्रम, सिद्धिस्थान और कालकी संख्या आदि बतलायी। उसी समय उन्हें सम्पूर्ण वेद-वेदाङ्ग भी पढ़ा दिये। तत्पश्चात् शिवजीने परशुरामको नागपाश, पाशुपतास्त्र, अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र, नारायणास्त्र, वायव्यास्त्र, वारुणास्त्र, गान्धर्वास्त्र, गारुडास्त्र, जृम्भणास्त्र, गदा, शक्ति, परशु, अमोघ उत्तम त्रिशूल, विधिपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंके मन्त्र, शस्त्रास्त्रोंके संहार और संधान, अक्षय धनुष, आत्मरक्षाका उपाय, संग्राममें विजय पानेका क्रम, अनेक प्रकारके मायायुद्ध, मन्त्रपूर्वक हुंकार, अपनी सेनाकी रक्षा तथा शत्रुसेनाके विनाशका ढंग, युद्धसंकटके समय नाना प्रकारके अनुपम उपाय, संसारको मोहित करनेवाली तथा बुढ़ापा और मृत्युका हरण करनेवाली विद्या भी सिखायी। परशुरामने चिरकालतक गुरुकुलमें ठहरकर सम्पूर्ण विद्याओंको सीखा। फिर तीर्थमें जाकर मन्त्रसिद्धि प्राप्त की। इसके बाद शिव आदिको नमस्कार करके वे अपने आश्रमको लौट आये।
(अध्याय ३०)
शिवजीका प्रसन्न होकर परशुरामको त्रैलोक्यविजय नामक कवच प्रदान करना
नारदने पूछा— भगवन्! अब मेरी यह सुननेकी इच्छा है कि भगवान् शंकरने दयावश परशुरामको कौन-सा मन्त्र तथा कौन-सा स्तोत्र और कवच दिया था? उस मन्त्रके आराध्य देवता कौन हैं? कवच धारण करनेका क्या फल है? तथा स्तोत्रपाठसे किस फलकी प्राप्ति होती है? वह सब आप बतलाइये।
नारायण बोले— नारद! उस मन्त्रके आराध्य देव गोलोकनाथ गोपगोपीश्वर सर्वसमर्थ परिपूर्णतम स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। शंकरने रत्नपर्वतके निकट स्वयंप्रभा नदीके तटपर पारिजात वनके मध्य स्थित आश्रममें लोकोंके देवता माधवके समक्ष परशुरामको ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक परम अद्भुत कवच, विभूतियोगसे सम्भूत महान् पुण्यमय ‘स्तवराज’ नामवाला स्तोत्र और सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला ‘मन्त्रकल्पतरु’ नामक मन्त्र प्रदान किया था।
महादेवजीने कहा— भृगुवंशी महाभाग वत्स! तुम प्रेमके कारण मुझे पुत्रसे भी अधिक प्रिय हो; अतः आओ कवच ग्रहण करो। राम! जो ब्रह्माण्डमें परम अद्भुत तथा विजयप्रद है, श्रीकृष्णके उस ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक कवचका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें श्रीकृष्णने गोलोकमें स्थित वृन्दावन नामक वनमें राधिकाश्रममें रासमण्डलके मध्य यह कवच मुझे दिया था। यह अत्यन्त गोपनीय तत्त्व, सम्पूर्ण मन्त्रसमुदायका विग्रहस्वरूप, पुण्यसे भी बढ़कर पुण्यतर परमोत्कृष्ट है और इसे स्नेहवश मैं तुम्हें बता रहा हूँ। जिसे पढ़कर एवं धारण करके मूलप्रकृति भगवती आद्याशक्तिने शुम्भ, निशुम्भ, महिषासुर और रक्तबीजका वध किया था। जिसे धारण करके मैं लोकोंका संहारक और सम्पूर्ण तत्त्वोंका जानकार हुआ हूँ तथा पूर्वकालमें जो दुरन्त और अवध्य थे, उन त्रिपुरोंको खेल-ही-खेलमें दग्ध कर सका हूँ। जिसे पढ़कर और धारण करके ब्रह्माने इस उत्तम सृष्टिकी रचना की है। जिसे धारण करके भगवान् शेष सारे विश्वको धारण करते हैं। जिसे धारण करके कूर्मराज शेषको