भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मेरी रक्षा करें। श्रीकृष्ण नैर्ऋत्यकोणमें मेरी रक्षा करें। श्रीहरि पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें। गोविन्द वायव्यकोणमें नित्य-निरन्तर मेरी रक्षा करें। रसिकशिरोमणि उत्तर दिशामें सदा मेरी रक्षा करें। वृन्दावनविहारकृत् सदा ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें। वृन्दावनीके प्राणनाथ ऊर्ध्वभागमें मेरी रक्षा करें। महाबली बलिहारी माधव सदैव मेरी रक्षा करें। नृसिंह जल, स्थल तथा अन्तरिक्षमें सदा मुझे सुरक्षित रखें। माधव सोते समय तथा जाग्रत्-कालमें सदा मेरा पालन करें तथा जो सबके अन्तरात्मा, निर्लेप और सर्वव्यापक हैं, वे भगवान् सब ओरसे मेरी रक्षा करें।

वत्स! इस प्रकार मैंने 'त्रैलोक्यविजय' नामक कवच, जो परम अनोखा तथा समस्त मन्त्रसमुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है, तुम्हें बतला दिया। मैंने इसे श्रीकृष्णके मुखसे श्रवण किया था। इसे जिस-किसीको नहीं बतलाना चाहिये। जो विधिपूर्वक गुरुका पूजन करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह भी विष्णुतुल्य हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। वह भक्त जहाँ रहता है, वहाँ लक्ष्मी और सरस्वती निवास करती हैं। यदि उसे कवच सिद्ध हो जाता है तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है और उसे करोड़ों वर्षोंकी पूजाका फल प्राप्त हो जाता है। हजारों राजसूय, सैकड़ों वाजपेय, दस हजार अश्वमेध, सम्पूर्ण महादान तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा—ये सभी इस त्रैलोक्यविजयकी सोलहवीं कलाकी भी समानता नहीं कर सकते। व्रत-उपवासका नियम, स्वाध्याय, अध्ययन, तपस्या और समस्त तीर्थोंमें स्नान—ये सभी इसकी एक कलाको भी नहीं पा सकते। यदि मनुष्य इस कवचको सिद्ध कर ले तो निश्चय ही उसे सिद्धि, अमरता और श्रीहरिकी दासता आदि सब कुछ मिल जाता है। जो इसका दस लाख जप करता है, उसे यह कवच सिद्ध हो जाता है और जो सिद्धकवच होता है, वह निश्चय ही सर्वज्ञ हो जाता है। परंतु जो इस कवचको जाने बिना श्रीकृष्णका भजन करता है, उसकी बुद्धि अत्यन्त मन्द है; उसे करोड़ों कल्पोंतक जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता। वत्स! इस कवचको धारण करके तुम आनन्दपूर्वक निःशङ्क होकर अनायास ही इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर डालो। बेटा! प्राणसंकटके समय राज्य दिया जा सकता है, सिर कटाया जा सकता है और प्राणोंका परित्याग भी किया जा सकता है; परंतु ऐसे कवचका दान नहीं करना चाहिये*। (अध्याय ३१)


* महादेव उवाच—

वत्सागच्छ महाभाग भृगुवंशसमुद्भव। पुत्राधिकोऽसि प्रेम्णा मे कवचं ग्रहणं कुरु॥
शृणु राम प्रवक्ष्यामि ब्रह्माण्डे परमाद्भुतम्। त्रैलोक्यविजयं नाम श्रीकृष्णस्य जयावहम्॥
श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके राधिकाश्रये। रासमण्डलमध्ये च मह्यं वृन्दावने वने॥
अतिगुह्यतरं तत्त्वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। पुण्यात् पुण्यतरं चैव परं स्नेहाद् वदामि ते॥
यद् धृत्वा पठनाद् देवी मूलप्रकृतिरीश्वरी। शुम्भं निशुम्भं महिषं रक्तबीजं जघान ह॥
यद् धृत्वाहं च जगतां संहर्ता सर्वतत्त्ववित्। अवध्यं त्रिपुरं पूर्वं दुरन्तमवलीलया॥
यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मा ससृजे सृष्टिमुत्तमाम्। यद् धृत्वा भगवान् शेषो विधत्ते विश्वमेव च॥
यद् धृत्वा कूर्मराजश्च शेषं धत्तेऽवलीलया। यद् धृत्वा भगवान् वायुर्विश्वाधारो विभुः स्वयं॥
यद् धृत्वा वरुणः सिद्धः कुबेरश्च धनेश्वरः। यद् धृत्वा पठनादिन्द्रो देवानामधिपः स्वयं॥
यद् धृत्वा भाति भुवने तेजोराशिः स्वयं रविः। यद् धृत्वा पठनाच्चन्द्रो महाबलपराक्रमः॥
अगस्त्यः सागरान् सप्त यद् धृत्वा पठनात् पपौ। चकार तेजसा जीर्णं दैत्यं वातापिसंज्ञकम्॥
यद् धृत्वा पठनाद् देवी सर्वाधारा वसुन्धरा। यद् धृत्वा पठनात् पूता गङ्गा भुवनपावनी॥