भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

३७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जिस पुरुषको यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है, उसके लिये विश्व करतलगत हो जाता है। वह समुद्रोंको पी सकता है, विश्वका संहार करनेमें समर्थ हो जाता है और इसी पाञ्चभौतिक शरीरसे वैकुण्ठमें जा सकता है। उसके चरणकमलकी धूलिके स्पर्शमात्रसे सारे तीर्थ पवित्र हो जाते हैं और पृथ्वी तत्काल पावन हो जाती है। मुने! जो भोग और मोक्षका प्रदाता है, सर्वेश्वर श्रीकृष्णका वह सामवेदोक्त ध्यान मेरे मुखसे श्रवण करो। जो रत्ननिर्मित सिंहासनपर आसीन हैं; जिनका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है; नेत्र नीले कमलकी शोभा छीने लेते हैं; मुख शारदीय पूर्णिमाके चन्द्रमाको मात कर रहा है, उसपर मन्द मुस्कानकी मनोहर छटा छायी हुई है। जो करोड़ों कामदेवोंकी भाँति सुन्दर, लीलाके धाम, मनोहर और रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित हैं। जिनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें चन्दनकी खौर लगी है। जो श्रेष्ठ पीताम्बर धारण किये हुए हैं। मुस्कराती हुई गोपियाँ सदा जिनकी ओर निहार रही हैं। जो प्रफुल्ल मालती-पुष्पोंकी माला तथा वनमालासे विभूषित हैं। जो सिरपर ऐसी कलँगी धारण किये हुए हैं, जिसमें कुन्द-पुष्पोंकी बहुतायत है, जो कर्पूरसे सुवासित है और चन्द्रमा एवं ताराओंसे युक्त आकाशकी प्रभाका उपहास कर रही है। जिनके सर्वाङ्गमें रत्नोंके भूषण सुशोभित हैं। जो राधाके वक्षःस्थलमें विराजमान रहते हैं। सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र और देवेन्द्र जिनकी सेवामें लगे रहते हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश और श्रुतियाँ जिनका स्तवन करती रहती हैं; उन श्रीकृष्णका मैं भजन करता हूँ।

जो मनुष्य इस ध्यानसे श्रीकृष्णका ध्यान करके उन्हें षोडशोपचार समर्पित कर भक्तिपूर्वक उनका भलीभाँति पूजन करता है, वह सर्वज्ञत्व प्राप्त कर लेता है। (पूजनकी विधि यों है—) पहले भगवान्‌को भक्तिपूर्वक अर्घ्य, पाद्य, आसन, वस्त्र, भूषण, गौ, अर्घ्य, मधुपर्क, परमोत्तम यज्ञसूत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुनः आचमन, अनेक प्रकारके पुष्प, सुवासित ताम्बूल, चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, मनोहर दिव्य शय्या, माला और तीन पुष्पाञ्जलि निवेदित करना चाहिये। तदनन्तर षडङ्गकी पूजा करके फिर गणकी विधिवत् पूजा करे। तत्पश्चात् श्रीदामा, सुदामा, वसुदामा, हरिभानु, चन्द्रभानु, सूर्यभानु और सुभानु—इन सातों श्रेष्ठ पार्षदोंका भक्तिभावसहित पूजन करे। फिर जो गोपीश्वरी, मूलप्रकृति, आद्याशक्ति, कृष्णशक्ति और कृष्णद्वारा पूज्य हैं, उन राधिकाकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। विद्वान्‌को चाहिये कि वह गोप और गोपियोंके समुदाय, मुझ शान्तस्वरूप महादेव, ब्रह्मा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी, विग्रहधारी सम्पूर्ण देवता और देवषट्ककी पञ्चोपचारद्वारा


कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः। स च भक्तो वसेद् यत्र लक्ष्मीर्वाणी वसेत्ततः॥
यदि स्यात् सिद्धकवचो जीवन्मुक्तो भवेत्तु सः। निश्चितं कोटिवर्षाणां पूजायाः फलमाप्नुयात्॥
राजसूयसहस्राणि वाजपेयशतानि च। अश्वमेधायुतान्येव नरमेधायुतानि च॥
महादानानि यान्येव प्रादक्षिण्यं भुवस्तथा। त्रैलोक्यविजयस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
व्रतोपवासनियमं स्वाध्यायाध्ययनं तपः। स्नानं च सर्वतीर्थेषु नास्यार्हन्ति कलामपि॥
सिद्धित्वममरत्वं च दास्यत्वं श्रीहरेरपि। यदि स्यात् सिद्धकवचः सर्वं प्राप्नोति निश्चितम्॥
स भवेत् सिद्धकवचो दशलक्षं जपेत्तु यः। यो भवेत् सिद्धकवचः सर्वज्ञः स भवेद् ध्रुवम्॥
इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कृष्णं सुमन्दधीः। कोटिकल्पप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥
गृहीत्वा कवचं वत्स महीं निःक्षत्रियां कुरु। त्रिःसप्तकृत्वो निःशङ्कः सदानन्दोऽवलीलया॥
राज्यं देयं शिरो देयं प्राणा देयाश्च पुत्रक। एवंभूतं च कवचं न देयं प्राणसंकटे॥
(३१।७–५७)

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