ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ३३
अग्निदेव बड़ी-बड़ी लपटें उठाते हुए करोड़ों ताड़ोंके समान विशाल रूप धारण करके प्रज्वलित होने लगे। उस अग्निको बढ़ते देख श्रीकृष्णने लीलापूर्वक 'जल' की रचना की। वे अपने मुखसे निःश्वास वायुके साथ जलकी एक-एक बूँद गिराने लगे। मुखसे निकले हुए उस बिन्दुमात्र जलने सम्पूर्ण विश्वको आप्लावित कर दिया। उसके किञ्चित् कणमात्र जलने उस प्रज्वलित अग्निको शान्त कर दिया। तभीसे जलके द्वारा आग बुझने लगी। तत्पश्चात् वहाँ एक पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ, जो उस अग्निके अधिदेवता थे। फिर पूर्वोक्त जलसे एक पुरुषका उत्थान हुआ, जिनका नाम 'वरुण' हुआ। वे ही जलके अधिष्ठाता देवता और समस्त जल-जन्तुओंके स्वामी हुए। इसके बाद उस अग्निदेवके वामपार्श्वसे एक कन्याका आविर्भाव हुआ, जिसका नाम 'स्वाहा' था। मनीषी पुरुष उसे अग्निकी पत्नी कहते हैं। जलेश्वर वरुणके वामपार्श्वसे भी एक कन्या प्रकट हुई, जो 'वरुणानी' के नामसे विख्यात थी। वही वरुणकी सती साध्वी प्रिया हुई। भगवान् श्रीकृष्णकी निःश्वास वायुसे श्रीमान् 'पवन' का प्रादुर्भाव हुआ, जो समस्त देहधारियोंके प्राण हैं। श्वास-प्रश्वासके रूपमें उन्हींकी कला प्रकट हुई है। वायुदेवके वामपार्श्वसे एक कन्या प्रकट हुई, जो वायुपत्नी 'वायवी' देवी कही गयी है।
श्रीकृष्णका शुक्र जलमें गिरा। वह एक हजार वर्षके बाद एक अंडेके रूपमें प्रकट हुआ। उसीसे महान् विराट् पुरुषकी उत्पत्ति हुई, जो सम्पूर्ण विश्वके आधार हैं। उन विराट् पुरुषके एक-एक रोम-कूपमें एक-एक ब्रह्माण्डकी स्थिति है। वे स्थूलसे भी स्थूलतम हैं। उनसे बड़ा दूसरा कोई नहीं है। वे परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। उन्हींको 'महाविष्णु' जानना चाहिये। वे ही सबके सनातन आधार हैं। जैसे जलमें कमलका पत्ता रहता है, उसी प्रकार वे महार्णवके जलमें शयन करते हैं। उनके शयन करते समय कानोंके मलसे दो दैत्य प्रकट हुए। वे दोनों जलसे उठकर ब्रह्माजीको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। तब भगवान् नारायणने उन दोनोंको अपने जघन-देशमें सुलाकर चक्रसे काट डाला। उन दोनोंके सम्पूर्ण मेदसे यह सारी पृथ्वी निर्मित हुई, जिससे इसका नाम 'मेदिनी' हुआ। उसीपर सम्पूर्ण विश्वकी स्थिति है। उसकी अधिष्ठात्री देवीका नाम 'वसुन्धरा' है। (अध्याय ४)
ब्राह्म आदि कल्पोंका परिचय, गोलोकमें श्रीकृष्णका नारायण आदिके साथ रासमण्डलमें निवास, श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे श्रीराधाका प्रादुर्भाव; राधाके रोमकूपोंसे गोपाङ्गनाओंका प्राकट्य तथा श्रीकृष्णसे गोपों, गौओं, बलीवर्दों, हंसों, श्वेत घोड़ों और सिंहोंकी उत्पत्ति; श्रीकृष्णद्वारा पाँच रथोंका निर्माण तथा पार्षदोंका प्राकट्य; भैरव, ईशान और डाकिनी आदिकी उत्पत्ति
महर्षि शौनकके पूछनेपर सौति कहते हैं—ब्रह्मन्! मैंने सबसे पहले ब्राह्मकल्पके चरित्रका वर्णन किया है। अब वाराहकल्प और पाद्मकल्प—इन दोनोंका वर्णन करूँगा, सुनिये। मुने! ब्राह्म, वाराह और पाद्म—ये तीन प्रकारके कल्प हैं; जो क्रमशः प्रकट होते हैं। जैसे सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये चारों युग क्रमसे कहे गये हैं, वैसे ही वे कल्प भी हैं। तीन सौ साठ युगोंका एक दिव्य युग माना गया है। इकहत्तर दिव्य युगोंका एक मन्वन्तर होता है। चौदह मनुओंके व्यतीत हो जानेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। ऐसे तीन सौ साठ