भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 810 में से

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पृष्ठ 433

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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भक्तिभावसे चन्द्रशेखर शिवको प्रणाम किया और शिवने उन सबको आशीर्वाद दिया। प्रजापति ब्रह्माने पार्वतीनाथ शिवसे सारा वृत्तान्त कहा। वह सब सुनकर भक्तवत्सल शंकरने तुरंत ही मुँह नीचा कर लिया। भक्तोंपर कष्ट आया सुनकर पार्वती और परमेश्वर शिवको बड़ा दुःख हुआ। तदनन्तर ब्रह्मा और शिवने देवसमूहों तथा वसुधाको यत्नपूर्वक सान्त्वना देकर घरको लौटा दिया। फिर वे दोनों देवेश्वर तुरंत धर्मके घर आये और उनके साथ विचार-विमर्श करकेवे तीनों श्रीहरिके धामको चल दिये। भगवान्‌के उस परम धामका नाम वैकुण्ठ है। वह जरा और मृत्युको दूर भगानेवाला है। ब्रह्माण्डसे ऊपर उसकी स्थिति है। वह उत्तम लोक मानो वायुके आधारपर स्थित है। (वास्तवमें वह चिन्मय लोक श्रीहरिसे भिन्न न होनेके कारण अपने-आपमें ही स्थित है। उसका दूसरा कोई आधार नहीं है।) उस सनातन धामकी स्थिति ब्रह्मलोकसे एक करोड़ योजन ऊपर है। दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित विचित्र वैकुण्ठधामका वर्णन कर पाना कवियोंके लिये असम्भव है। पद्मराग और नीलमणिके बने हुए राजमार्ग उस धामकी शोभा बढ़ाते हैं। मनके समान तीव्र गतिसे जानेवाले वे ब्रह्मा, शिव और धर्म सब-के-सब उस मनोहर वैकुण्ठधाममें जा पहुँचे। श्रीहरिके अन्तःपुरमें पहुँचकर उन सबने वहाँ उनके दर्शन किये। वे श्रीहरि दिव्य रत्नमय अलङ्कारोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर बैठे थे। रत्नोंके बाजूबंद, कंगन और नूपुर उनके हाथ-पैरोंकी शोभा बढ़ाते थे। दिव्य रत्नोंके बने हुए दो कुण्डल उनके दोनों गालोंपर झलमला रहे थे। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था तथा आजानुलम्बिनी वनमाला उनके अग्रभागको विभूषित कर रही थी। सरस्वतीके प्राणवल्लभ श्रीहरि शान्तभावसे बैठे थे। लक्ष्मीजी उनके चरणारविन्दोंकी सेवा कर रही थीं। करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्यलीलासे वे प्रकाशित हो रहे थे। उनके चार भुजाएँ थीं और मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षद उनकी सेवामें जुटे थे। उनका सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित था तथा उनका मस्तक रत्नमय मुकुटसे जगमगा रहा था। वे परमानन्द-स्वरूप भगवान् भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल दिखायी देते थे। मुने! ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंने भक्तिभावसे उनके चरणोंमें प्रणाम किया और श्रद्धापूर्वक मस्तक झुकाकर बड़ी भक्तिके साथ उनकी स्तुति की। उस समय वे परमानन्दके भारसे दबे हुए थे। उनके अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था।

ब्रह्माजी बोले—मैं शान्त, सर्वेश्वर तथा अच्युत उन कमलाकान्तको प्रणाम करता हूँ, जिनकी हम तीनों विभिन्न कलाएँ हैं तथा समस्त देवता जिनकी कलाकी भी अंशकलासे उत्पन्न हुए हैं। निरञ्जन! मनु, मुनीन्द्र, मानव तथा चराचर प्राणी आपसे ही आपके कलाकी अंशकलाद्वारा प्रकट हुए हैं।

भगवान् शंकरने कहा—आप अविनाशी तथा अविकारी हैं। योगीजन आपमें रमण करते हैं। आप अव्यक्त ईश्वर हैं। आपका आदि नहीं है; परंतु आप सबके आदि हैं। आपका स्वरूप आनन्दमय है। आप सर्वरूप हैं। अणिमा आदि सिद्धियोंके कारण तथा सबके कारण हैं। सिद्धिके ज्ञाता, सिद्धिदाता और सिद्धिरूप हैं। आपकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है ?

धर्म बोले—जिस वस्तुका वेदमें निरूपण किया गया है, उसीका विद्वान् लोग वर्णन कर सकते हैं। जिनको वेदमें ही अनिर्वचनीय कहा गया है, उनके स्वरूपका निरूपण कौन कर सकता है ? जिसके लिये जिस वस्तुकी सम्भावना की जाती है, वह गुणरूप होती है। वही उसका स्तवन है। जो निरञ्जन (निर्मल) तथा गुणोंसे पृथक्—निर्गुण हैं; उन परमात्माकी मैं क्या स्तुति करूँ?

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