ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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बढ़ा देती है। पक्षिराज गरुड़की चोंचकी शोभासे सम्पन्न उन्नत नासिकासे वे सब-की-सब विभूषित हैं। गजराजके युगल गण्डस्थलकी भाँति उन्नत उरोजोंके भारसे वे झुकी-सी जान पड़ती हैं। उनका हृदय श्रीकृष्णविषयक अनुरागके देवता कन्दर्पके बाण-प्रहारसे जर्जर हुआ रहता है। वे दर्पणोंमें पूर्ण चन्द्रमाके समान अपने मनोहर मुखके सौन्दर्यको देखनेके लिये उत्सुक रहती हैं। श्रीराधिकाके चरणारविन्दोंकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहनेका सौभाग्य सुलभ हो, यही उनका मनोरथ है। ऐसी गोपकिशोरियोंसे भरा-पूरा वह रासमण्डल श्रीराधिकाकी आज्ञासे सुन्दरियोंके समुदायद्वारा रक्षित है—असंख्य सुन्दरियाँ उसकी रक्षामें नियुक्त रहती हैं।
श्वेत, रक्त एवं लोहित वर्णवाले कमलोंसे व्यास एवं सुशोभित लाखों क्रीड़ा-सरोवर रासमण्डलको सब ओरसे घेरे हुए हैं, जिनमें असंख्य भ्रमरोंके समुदाय गूँजते रहते हैं। सहस्रों पुष्पित उद्यान तथा फूलोंकी शय्याओंसे संयुक्त असंख्य कुञ्ज-कुटीर रासमण्डलकी सीमामें यत्र-तत्र शोभा पा रहे हैं। उन कुटीरोंमें भोगोपयोगी द्रव्य, कर्पूर, ताम्बूल, वस्त्र, रत्नमय प्रदीप, श्वेत चँवर, दर्पण तथा विचित्र पुष्पमालाएँ सब ओर सजाकर रखी गयी हैं। इन समस्त उपकरणोंसे रासमण्डलकी शोभा बहुत बढ़ गयी है। उस रासमण्डलको देखकर जब वे पर्वतकी सीमासे बाहर हुए तो उन्हें विलक्षण, रमणीय और सुन्दर वृन्दावनके दर्शन हुए। वृन्दावन राधा-माधवको बहुत प्रिय है। वह उन्हीं दोनोंका क्रीडास्थल है। उसमें कल्पवृक्षोंके समूह शोभा पाते हैं। विरजा-तीरके नीरसे भीगे हुए मन्द समीर उस वनके वृक्षोंको शनैः-शनैः आन्दोलित करते रहते हैं। कस्तूरीयुक्त पल्लवोंका स्पर्श करके चलनेवाली मन्द वायुका सम्पर्क पाकर वह सारा वन सुगन्धित बना रहता है। वहाँके वृक्षोंमें नये-नये पल्लव निकले रहते हैं। वहाँ सर्वत्र कोकिलोंकी काकली सुनायी देती है। वह वनप्रान्त कहीं तो केलिकदम्बोंके समूहसे कमनीय और कहीं मन्दार, चन्दन, चम्पा तथा अन्यान्य सुगन्धित पुष्पोंकी सुगन्धसे सुवासित देखा जाता है। आम, नारंगी, कटहल, ताड़, नारियल, जामुन, बेर, खजूर, सुपारी, आमड़ा, नीबू, केला, बेल और अनार आदि मनोहर वृक्ष-समूहों तथा सुपक्व फलोंसे लदे हुए दूसरे-दूसरे वृक्षोंद्वारा उस वृन्दावनकी अपूर्व शोभा हो रही है। प्रियाल, शाल, पीपल, नीम, सेमल, इमली तथा अन्य वृक्षोंके शोभाशाली समुदाय उस वनमें सब ओर सदा भरे रहते हैं। कल्पवृक्षोंके समूह उस वनकी शोभा बढ़ाते हैं। मल्लिका (मोतिया या बेला), मालती, कुन्द, केतकी, माधवी लता और जूही इत्यादि लताओंके समूह वहाँ सब ओर फैले हैं। मुने! वहाँ रत्नमय दीपोंसे प्रकाशित तथा धूपकी गन्धसे सुवासित असंख्य कुञ्ज-कुटीर उस वनमें शोभा पाते हैं। उनके भीतर शृङ्गारोपयोगी द्रव्य संगृहीत हैं। सुगन्धित वायु उन्हें सुवासित करती रहती है। वहाँ चन्दनका छिड़काव हुआ है। उन कुटीरोंके भीतर फूलोंकी शय्याएँ बिछी हैं, जो पुष्पमालाओंकी जालीसे सुशोभित हैं। मधु-लोलुप मधुपोंके मधुर गुञ्जारवसे वृन्दावन मुखरित रहता है। रत्नमय अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न गोपाङ्गनाओंके समूहसे वह वन आवेष्टित है। करोड़ों गोपियाँ श्रीराधाकी आज्ञासे उसकी रक्षा करती हैं। उस वनके भीतर सुन्दर-सुन्दर और मनोहर बत्तीस कानन हैं। वे सभी उत्तम एवं निर्जन स्थान हैं। मुने! वृन्दावन सुपक्व, मधुर एवं स्वादिष्ट फलोंसे सम्पन्न तथा गोष्ठों और गौओंके समूहोंसे परिपूर्ण है। वहाँ सहस्रों पुष्पोद्यान सदा खिले और सुगन्धसे भरे रहते हैं, उनमें मधुलोभी भ्रमरोंके समुदाय मधुर गुञ्जन करते फिरते हैं।
श्रीकृष्णके तुल्य रूपवाले तथा उत्तम रत्न-