भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 438

४२८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उस राजमार्गके तटप्रान्तकी शोभा बढ़ाते थे। उन सबपर कुंकुम-केसर छिड़के गये थे। जगह-जगह उत्तम रत्नोंके बने हुए मङ्गलघट स्थापित थे, उनमें फल और शाखाओंसहित पल्लव शोभा पाते थे। सिन्दूर, कुंकुम, गन्ध और चन्दनसे उनकी अर्चना की गयी थी। पुष्पमालाओंसे विभूषित हुए वे मङ्गलकलश उभयपार्श्वमें उस राजमार्गकी शोभावृद्धि करते थे। क्रीडामें तत्पर हुई झुंड-की-झुंड गोपिकाएँ उस मार्गको घेरे खड़ी थीं।

उपर्युक्त मनोरम प्रदेश चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे चर्चित थे। बहुमूल्य रत्नोंसे वहाँ मणिमय सोपानोंका निर्माण किया गया था। कुल मिलाकर सोलह द्वार थे, जो अग्निशुद्ध रमणीय चिन्मय वस्त्रों, श्वेत चामरों, दर्पणों, रत्नमयी शय्याओं तथा विचित्र पुष्पमालाओंसे शोभायमान थे। बहुत-से द्वारपाल उन प्रदेशोंकी रक्षा करते थे। उनके चारों ओर खाइयाँ थीं और लाल रंगके परकोटोंसे वे घिरे हुए थे। इन मनोरम प्रदेशोंका दर्शन करके देवता वहाँसे आगे बढ़नेको उद्यत हुए। वे जल्दी-जल्दी कुछ दूरतक गये। तब वहाँ उन्हें रासेश्वरी श्रीराधाका आश्रम दिखायी दिया। नारद! देवताओंकी आदिदेवी गोपीशिरोमणि श्रीकृष्णप्राणाधिका राधिकाका वह निवासस्थान बड़ा ही सुन्दर बनाया गया था। रमणीय द्रव्योंके कारण उसकी मनोहरता बहुत बढ़ गयी थी। वहाँका सब कुछ सबके लिये अनिर्वचनीय था। बड़े-से-बड़े विद्वान् भी उस स्थानका सम्यक् वर्णन नहीं कर सके हैं। वह मनोहर आश्रम गोलाकार बना है तथा उसका विस्तार बारह कोसका है। उसमें सौ मन्दिर बने हुए हैं। वह अद्भुत आश्रम दिव्य रत्नोंके तेजसे जगमगाता रहता है। बहुमूल्य रत्नोंके सार-समूहसे उसकी रचना हुई है। वह दुर्लङ्घ्य एवं गहरी खाइयोंसे सुशोभित है। कल्पवृक्ष उस आश्रमको सब ओरसे घेरे हुए हैं। उसके भीतर सैकड़ों पुष्पोद्यान शोभा पाते हैं। बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित परकोटोंसे वह आश्रममण्डल घिरा हुआ है। उसमें सात दरवाजे हैं, जो सभी उत्तम रत्नोंकी बनी हुई वेदिकाओंसे युक्त हैं। उन दरवाजोंमें विचित्र रत्न जड़े गये हैं और नाना प्रकारके चित्र बने हैं। क्रमशः बने हुए इन सातों द्वारोंको पार करनेपर वह आश्रम सोलह द्वारोंसे युक्त है। देवताओंने देखा—उसकी चहारदीवारी सहस्र धनुष ऊँची है। उत्तम रत्नोंके बने हुए अत्यन्त मनोहर छोटे-छोटे कलशोंके समुदाय अपने तेजसे उस परकोटेको उद्भासित कर रहे हैं। उसे देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे उसकी परिक्रमा करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ कुछ दूर और आगे गये। सामने चलते हुए वे इतने आगे बढ़ गये कि वह आश्रम उनसे पीछे हो गया। मुने! तदनन्तर उन्होंने गोपों और गोपिकाओंके उत्तम आश्रम देखे, जिनमें बहुमूल्य रत्न जड़े हुए हैं। उनकी संख्या सौ करोड़ है। इस प्रकार सब ओर गोपों और गोपिकाओंके सम्पूर्ण आश्रमको तथा अन्य नये-नये रमणीय स्थलोंको देखते-देखते उन देवेश्वरोंने समस्त गोलोकका निरीक्षण किया। वह सब देखकर उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। तदनन्तर फिर वही गोलाकार रम्य वृन्दावन, शतशृंग पर्वत तथा उसके बाहर विरजा नदी दिखायी दी। विरजा नदीके बाद देवताओंने सब कुछ सूना ही देखा। वह अद्भुत गोलोक उत्तम रत्नोंसे निर्मित तथा वायुके आधारपर स्थित था। श्रीराधिकाकी आज्ञाका अनुसरण करते हुए परमेश्वर श्रीकृष्णकी इच्छासे उसका निर्माण हुआ है। वह केवल मङ्गलका धाम है और सहस्रों सरोवरोंसे सुशोभित है।

मुने! देवताओंने वहाँ अत्यन्त मनोहर नृत्य तथा सुन्दर तालसे युक्त रमणीय संगीत देखा, जहाँ श्रीराधा-कृष्णके गुणोंका अनुवाद हो रहा था। उस अमृतोपम गीतको सुनते ही वे देवता मूर्च्छित हो गये। फिर क्षणभरमें सचेत हो मन-