ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें४४० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
रहे थे। वह अग्निशुद्ध सूक्ष्म गेरुए वस्त्रोंसे सजाया गया था। श्रेष्ठ रत्नोंके बने हुए सहस्रों कलश उसकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। पारिजातपुष्पोंके हारोंसे उस विमानको सुसज्जित किया गया था। सोनेका बना हुआ वह सुन्दर विमान अनुपम तेजःपुञ्जमय दिखायी देता था। उससे सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था तथा उस विमानपर बहुत-से श्रेष्ठ पार्षद बैठे हुए थे। उस विमानमें एक श्यामसुन्दर कमनीय पुरुष दृष्टिगोचर हुए, जिनके चार हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पा रहे थे। उन श्रेष्ठ पुरुषने पीताम्बर पहन रखा था। उनके मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल और वक्षःस्थलपर वनमाला शोभा दे रही थी। उनके श्रीअङ्ग चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा केसरके अङ्गरागसे अलंकृत थे। चार भुजाएँ और मुस्कराता हुआ मनोहर मुख देखने ही योग्य थे। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे आकुल दिखायी देते थे। श्रेष्ठ मणिरत्नोंके सारातिसार तत्त्वसे बने हुए आभूषण उनके अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके वामभागमें सुरम्य शरीरवाली शुक्लवर्णा, मनोहरा, ज्ञानरूपा एवं विद्याकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती दिखायी दीं, जिनके हाथोंमें वेणु, वीणा और पुस्तकें थीं। वे भी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ती थीं। उन महानारायणके दाहिने भागमें शरत्कालके चन्द्रमाकी-सी प्रभा तथा तपाये हुए सुवर्णकी भाँति कान्तिसे प्रकाशमान परम मनोहरा और रमणीया देवी लक्ष्मी दृष्टिगोचर हुईं, जिनके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कान खेल रही थी। उनके सुन्दर कपोल उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे जगमगा रहे थे। बहुमूल्य रत्न, महामूल्यवान् वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते थे। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित बाजूबंद और कंगन उनकी भुजाओंकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वके बने हुए मञ्जीर अपनी मधुर झनकार फैला रहे थे। पारिजातके फूलोंकी मालाओंसे वक्षःस्थल उज्ज्वल दिखायी देता था। उनकी वेणी प्रफुल्ल मालतीकी मालाओंसे अलंकृत थी। सुन्दरी रमाका मनोहर मुख शरत्कालके चन्द्रमाकी प्रभाको छीने लेता था। उनके भालदेशमें कस्तूरीबिन्दुसे युक्त सिन्दूरका तिलक शोभा दे रहा था। शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंके समान नेत्रोंमें मनोहर काजलकी रेखा शोभायमान थी। उनके हाथमें सहस्र दलोंसे संयुक्त लीलाकमल सुशोभित होता था। वे अपनी ओर देखनेवाले नारायणदेवको तिरछी चितवनसे निहार रही थीं। पत्नियों और पार्षदोंके साथ शीघ्र ही विमानसे उतरकर वे नारायणदेव गोप-गोपियोंसे भरी हुई उस रमणीय सभामें जा पहुँचे। उन्हें देखते ही ब्रह्मा आदि देवता, गोप और गोपी सब-के-सब सानन्द उठकर खड़े हो गये। सबके हाथ जुड़े हुए थे। देवर्षिगण सामवेदोक्त स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति समाप्त होनेपर नारायणदेव आगे जाकर श्रीकृष्णविग्रहमें विलीन हो गये। यह परम आश्चर्यकी बात देखकर सबको बड़ा विस्मय हुआ।
इसी समय वहाँ एक दूसरा सुवर्णमय रथ आ पहुँचा। उससे जगत्का पालन करनेवाले त्रिलोकीनाथ विष्णु स्वयं उतरकर उस सभामें आये। उनके चार भुजाएँ थीं। वनमालासे विभूषित पीताम्बरधारी सम्पूर्ण अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न तथा करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान श्रीमान् विष्णु बड़े मनोहर दिखायी देते थे। वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। मुने! उन्हें देखते ही सब लोग उठकर खड़े हो गये। सबने प्रणाम करके उनका स्तवन किया। तत्पश्चात् वे भी वहीं श्रीराधिकावल्लभ श्रीकृष्णके शरीरमें लीन हो गये। यह दूसरा महान् आश्चर्य देखकर उन सबको बड़ा विस्मय हुआ।
श्वेतद्वीपनिवासी श्रीविष्णुके श्रीकृष्णविग्रहमें विलीन हो जानेके बाद वहाँ तुरंत ही शुद्ध