ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४५३
कर रही है। उसके प्रसन्न मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसे देखकर वसुदेवजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे तुरंत ही पुत्रको वहाँ सुलाकर कन्याको गोदमें ले डरते-डरते मथुराकी ओर गये
और अपनी पत्नीके सूतिकागारमें जा पहुँचे। वहीं उन्होंने उस महामायास्वरूपिणी बालिकाको सुला दिया। बालिका जोर-जोरसे रोने लगी। उसे देखकर देवकी थर्रा उठी। उस बालिकाने अपने रोनेकी आवाजसे ही रक्षकोंको जगा दिया। रक्षक शीघ्र उठकर खड़े हो गये और उस बालिकाको छीनकर कंसके निकट जा पहुँचे। देवकी और वसुदेव भी शोकसे विह्वल हो पीछे-पीछे गये। महामुने! बालिकाको देखकर कंसको अधिक प्रसन्नता नहीं हुई। उस रोती हुई बच्चीपर भी उसे दया नहीं आयी। वह क्रूरकर्मा असुर उस बालिकाको लेकर पत्थरपर दे मारनेके लिये आगे बढ़ा। उस समय वसुदेव और देवकीने बड़े आदरके साथ उससे कहा—'नृपश्रेष्ठ कंस! तुम नीतिशास्त्रमें निपुण विद्वान् हो; अतः हमारी सच्ची, नीतियुक्त तथा मनोहर बात सुनो। भैया! तुमने हमारे भाई-बन्धु होकर भी हम दोनोंके छः पुत्रोंका वध कर डाला, फिर भी तुम्हें दया नहीं आती! अब इस आठवें गर्भमें यह अबला बालिका प्राप्त हुई है। हमारी इस बच्चीको मारकर तुम्हें भूतलपर कौन-सा महान् ऐश्वर्य प्राप्त हो जायगा? क्या एक अबला युद्धके मुहानेपर तुम्हारी राज्यलक्ष्मीका हनन करनेमें समर्थ हो सकती है?' ऐसा कहकर वसुदेव और देवकी दोनों दुरात्मा कंसके सामने वहाँ फूट-फूटकर रोने लगे। कंस बड़ा ही निर्दय था। उसने उन दोनोंकी बातें सुनकर इस प्रकार उत्तर दिया।
कंस बोला—बहिन! मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें समझाता हूँ। विधाता दैववश एक तिनकेके द्वारा पर्वतको धराशायी करनेमें समर्थ हैं। एक कीड़ेके द्वारा सिंह और व्याघ्रको तथा एक मच्छरके द्वारा विशालकाय हाथीको नष्ट कर सकते हैं। शिशुके द्वारा महान् वीरका, क्षुद्र जन्तुओंन्द्वारा विशालकाय प्राणीका, चूहेके द्वारा बिल्लीका और मेढकके द्वारा सर्पका वध करा सकते हैं। इस प्रकार विधाता जन्यके द्वारा जनकका, भक्ष्यके द्वारा भक्षकका, अग्निके द्वारा जलका और सूखे तिनकेके द्वारा अग्निका नाश करनेमें समर्थ हैं। एकमात्र द्विज जह्नुने सात