ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४६० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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साथ मर्त्यलोकमें जाकर श्रीहरिके मुखकमलका दर्शन प्राप्त करोगी।' तदनन्तर कश्यपजीने अदितिके घर जाकर उनकी इच्छा पूर्ण की। उसी ऋतुसे देवराजका जन्म हुआ। इसके बाद अदितिने देवकीके रूपमें, कद्रूने रोहिणीके रूपमें और कश्यपजीने श्रीकृष्णके पिता श्रीवसुदेवजीके रूपमें जन्म ग्रहण किया।
मुने! यह सारा गोपनीय रहस्य बताया गया। अब अनन्त, अप्रमेय तथा सहस्रों मस्तकवाले भगवान् बलदेवजीके जन्मका वृत्तान्त सुनो। साध्वि! रोहिणी वसुदेवजीकी प्रेयसी भार्या थीं। मुने! वे वसुदेवजीकी आज्ञासे संकर्षणकी रक्षाके लिये गोकुलमें चली गयीं। कंससे भयभीत होनेके कारण उन्हें वहाँसे पलायन करना पड़ा था। उन दिनों योगमायाने श्रीकृष्णकी आज्ञासे देवकीके सातवें गर्भको रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया था। उस गर्भको स्थापित करके वे देवी तत्काल कैलासपर्वतको चली गयीं। कुछ दिनोंके बाद रोहिणी नन्दभवनमें श्रीकृष्णके अंशस्वरूप पुत्रको जन्म दिया। उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान गौर थी। वह बालक साक्षात् ईश्वर था। उसके मुखपर मन्द हास्यकी मनोहर छटा एवं प्रसन्नता छा रही थी। वह ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहा था। उसके जन्ममात्रसे देवताओंमें आनन्द छा गया। स्वर्गलोकमें दुन्दुभि, आनक और मुरज आदि दिव्य वाद्य बज उठे। आनन्दमग्न हुए देवता शङ्खध्वनिके साथ जय-जयकार करने लगे। नन्दका हृदय हर्षसे उल्लसित हो उठा। उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दिया। धायने आकर बालककी नाल काटी और उसे नहलाया। समस्त आभूषणोंसे विभूषित गोपियाँ जय-जयकार करने लगीं। उस पराये पुत्रके लिये भी नन्दने बड़े आदरके साथ महान् उत्सव मनाया। यशोदाजीने गोपियों तथा ब्राह्मणियोंको प्रसन्नतापूर्वक धन दान किया। नाना प्रकारके द्रव्य, सिन्दूर एवं तैल प्रदान किये।
वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे नन्द और यशोदाके तपका प्रसङ्ग कहा, हलधरके जन्मकी कथा कही तथा रोहिणीजीके चरित्रको सुनाया है। अब तुम्हें जो अभीष्ट है, वह नन्दपुत्रोत्सवका प्रसङ्ग सुनो। वह सुखदायक, मोक्षदायक तथा जन्म, मृत्यु और जरावस्थाका निवारण करनेवाला सारतत्त्व है। श्रीकृष्णका मङ्गलमय चरित्र वैष्णवोंका जीवन है। वह समस्त अशुभोंका विनाशक तथा श्रीहरिके दास्यभावको देनेवाला है।
वसुदेवजीने श्रीकृष्णको नन्दभवनमें रख दिया और उनकी कन्याको गोदमें लेकर वे हर्षपूर्वक अपने घरको लौट आये। यह प्रसङ्ग तथा उस कन्याका श्रवणसुखद चरित्र पहले कहा जा चुका है। अब गोकुलमें जो श्रीकृष्णकी मङ्गलमयी लीला प्रकट हुई, उसे बताता हूँ, सुनो। जब वसुदेवजी अपने घरको लौट गये, तब जया तिथि अष्टमीसे युक्त उस विजयपूर्ण मङ्गलमय सूतिकागारमें नन्द और यशोदाने देखा—उनका पुत्र धरतीपर पड़ा हुआ है। उसके श्रीअङ्गोंसे नवीन मेघमालाके समान तेजःपुञ्जमयी श्यामकान्ति प्रस्फुटित हो रही है। वह नग्न बालक बड़ा सुन्दर दिखायी देता था। उसकी दृष्टि गृहके शिखरभागकी ओर लगी हुई थी। उसका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। दोनों नेत्र नील कमलकी शोभाको छीने लेते थे। वह कभी रोता था और कभी हँसने लगता था। उसके श्रीअङ्गोंमें धूलिके कण लगे हुए थे। उसके दोनों हाथ धरतीपर टिके हुए थे और युगल चरणारविन्द प्रेमके पुञ्ज-से जान पड़ते थे। उस दिव्य बालक श्रीहरिको देखकर पत्नीसहित नन्दको बड़ी प्रसन्नता हुई। धायने ठंडे जलसे बालकको नहलाया और उसकी नाल काट दी। उस समय गोपियाँ हर्षसे जय-जयकार करने लगीं। व्रजकी सारी गोपिकाएँ, बालिका और युवतियाँ भी ब्राह्मणपत्नियोंके साथ सूतिकागारमें आयीं। उन सबने आकर बालकको