भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६७ केशव रक्षा करें। हृषीकेश अधरोष्ठकी, गदाग्रज दन्तपंक्तिकी, रासेश्वर रसनाकी और भगवान् वामन तालुकी रक्षा करें। मुकुन्द तुम्हारे वक्षःस्थलकी रक्षा करें। दैत्यसूदन उदरका पालन करें। जनार्दन नाभिकी और विष्णु तुम्हारी ठोढ़ीकी रक्षा करें। पुरुषोत्तम तुम्हारे दोनों नितम्बों और गुह्य भागकी रक्षा करें। भगवान् जानकीश्वर तुम्हारे युगल जानुओं (घुटनों) - की सर्वदा रक्षा करें। नृसिंह सर्वत्र संकटमें दोनों हाथोंकी और कमलोद्भव वराह तुम्हारे दोनों चरणोंकी रक्षा करें। ऊपर नारायण और नीचे कमलापति तुम्हारी रक्षा करें। पूर्व दिशामें गोपाल तुम्हारा पालन करें। अग्निकोणमें दशमुखहन्ता श्रीराम तुम्हारी रक्षा करें। दक्षिण दिशामें वनमाली, नैर्ऋत्यकोणमें वैकुण्ठ तथा पश्चिम दिशामें सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले स्वयं वासुदेव तुम्हारा पालन करें। वायव्यकोणमें अजन्मा विष्टरश्रवा श्रीहरि सदा तुम्हारी रक्षा करें। उत्तर दिशामें कमलासन ब्रह्मा अपने तेजसे सदा तुम्हारी रक्षा करें। ईशानकोणमें ईश्वर रक्षा करें। शत्रुजित् सर्वत्र पालन करें। जल, थल और आकाशमें तथा निद्रावस्थामें श्रीरघुनाथजी रक्षा करें। ब्रह्मन् ! इस प्रकार परम अद्भुत कवचका वर्णन किया गया। पूर्वकालमें मेरे स्मरण करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने कृपापूर्वक मुझे इसका उपदेश दिया था। शुम्भके साथ जब निर्लक्ष्य, घोर एवं दारुण संग्राम चल रहा था, उस समय आकाशमें खड़ी हो मैंने इस कवचकी प्राप्तिमात्रसे तत्काल उसे पराजित कर दिया था। इस कवचके प्रभावसे शुम्भ धरतीपर गिरा और मर गया। पहले सैकड़ों वर्षोंतक भयंकर युद्ध करके जब शुम्भ मर गया, तब कृपालु गोविन्द आकाशमें स्थित हो कवच और माल्य देकर गोलोकको चले गये। मुने ! इस प्रकार कल्पान्तरका वृत्तान्त कहा गया है। इस कवचके प्रभावसे कभी मनमें भय नहीं होता है। मैंने प्रत्येक कल्पमें श्रीहरिके साथ रहकर करोड़ों ब्रह्माओंको नष्ट होते देखा है। ऐसा कह कवच देकर देवी योगनिद्रा अन्तर्धान हो गयी और कमलोद्भव ब्रह्मा भगवान् विष्णुके नाभिकमलमें निःशंकभावसे बैठे रहे। जो इस उत्तम कवचको सोनेके यन्त्रमें मढ़ाकर कण्ठ या दाहिनी बाँहमें बाँधता है, उसकी बुद्धि सदा शुद्ध रहती है तथा उसे विष, अग्नि, सर्प और शत्रुओंसे कभी भय नहीं होता। जल, थल और अन्तरिक्षमें तथा निद्रावस्थामें भगवान् सदा उसकी रक्षा करते हैं*। *हस्तं दत्त्वा शिरोगात्रे पपाठ कवचं द्विजः। वदामि तत्ते विप्रेन्द्र कवचं सर्वलक्षणम् ॥ यदत्तं मायया पूर्वं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥ निद्रिते जगतीनाथे जले च जलशायिनि। भीताय स्तुतिकर्त्रे च मधुकैटभयोर्भयात् ॥ योगनिद्रोवाच दूरीभूतं कुरु भयं भयं किं ते हरौ स्थिते। स्थितायां मयि च ब्रह्मन् सुखं तिष्ठ जगत्पते ॥ श्रीहरिः पातु ते वक्त्रं मस्तकं मधुसूदनः। श्रीकृष्णश्चक्षुषी पातु नासिकां राधिकापतिः ॥ कर्णयुग्मं च कण्ठं च कपालं पातु माधवः। कपोलं पातु गोविन्दः केशांश्च केशवः स्वयम् ॥ अधरोष्ठं हृषीकेशो दन्तपंक्तिं गदाग्रजः। रासेश्वरश्च रसनां तालुकं वामनो विभुः ॥ वक्षः पातु मुकुन्दस्ते जठरं पातु दैत्यहा। जनार्दनः पातु नाभिं पातु विष्णुश्च ते हनुम् ॥ नितम्बयुग्मं गुह्यं च पातु ते पुरुषोत्तमः। जानुयुग्मं जानकीशः पातु ते सर्वदा विभुः ॥ हस्तयुग्मं नृसिंहश्च पातु सर्वत्र सङ्कटे। पादयुग्मं वराहश्च पातु ते कमलोद्भवः ॥ ऊर्ध्वं नारायणः पातुह्यधस्तात् कमलापतिः। पूर्वस्यां पातु गोपालः पातु वह्नौ दशास्यहा ॥ वनमाली पातु याम्यां वैकुण्ठः पातु नैर्ऋतौ। वारुण्यां वासुदेवश्च सतो रक्षाकरः स्वयम् ॥ पातु ते सन्ततमजो वायव्यां विष्टरश्रवाः। उत्तरे च सदा पातु तेजसा जलजासनः ॥