ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६९
मानो चारों वेदोंका तेज मूर्तिमान् हो गया हो। उनके कण्ठमें साक्षात् सरस्वतीका वास था। वे शास्त्रीय सिद्धान्तके एकमात्र विशेषज्ञ थे और दिन-रात श्रीकृष्णचरणारविन्दोंके ध्यानमें तत्पर रहते थे। उन्हें जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त थी। वे सिद्धोंके स्वामी, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी थे।
उन्हें देखकर यशोदाजी खड़ी हो गयीं। उन्होंने मस्तक झुकाकर मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन देकर आतिथ्यके लिये पाद्य, अर्घ्य, गौ तथा मधुपर्क निवेदन किया। मुस्कराती हुई नन्दरानीने अपने बालकसे मुनीन्द्रकी वन्दना करवायी।
मुनिने भी मन-ही-मन श्रीहरिको सौ-सौ प्रणाम किये और प्रसन्नतापूर्वक वेदमन्त्रोंके अनुकूल आशीर्वाद दिया। यशोदाजीने मुनिके शिष्योंको भी प्रणाम किया तथा भक्तिभावसे उन सबके लिये पृथक्-पृथक् पाद्य आदि अर्पित किये। उन शिष्योंने यशोदाजीको आशीर्वाद दिया। मुनि अपने शिष्योंके साथ पैर धोकर जब सिंहासनपर बैठे, तब सती-साध्वी यशोदा बालकको गोदमें ले भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर दोनों हाथ जोड़ मुनिके आगमनका कारण पूछनेको उद्यत हुईं। वे बोलीं—'मुने! आप स्वात्माराम महर्षि हैं, आपसे कुशल-मङ्गल पूछना यद्यपि उचित नहीं है, तथापि इस समय मैं आपका कुशल-समाचार पूछ रही हूँ। अबला बुद्धिहीना होती है। अतः आप मेरे इस दोषको क्षमा कर देंगे। साधुपुरुष सदा ही मूढ़ मनुष्योंके दोषोंको क्षमा करते रहते हैं।'
तदनन्तर अङ्गिरा, अत्रि, मरीचि और गौतम आदि बहुत-से ऋषि-मुनियोंके नाम लेकर यशोदाने पूछा—'प्रभो! इन पुण्यश्लोक महात्माओंमेंसे आप कौन हैं। कृपया मुझे बताइये। यद्यपि आपसे उत्तर पानेके योग्य मैं नहीं हूँ, तथापि आप मुझे मेरी पूछी हुई बात बताइये। आप-जैसे महात्मा पुरुष प्रसन्नमनसे शिशुको आशीर्वाद देने योग्य हैं। निश्चय ही ब्राह्मणोंका आशीर्वाद तत्काल पूर्ण मङ्गलकारी होता है।'
ऐसा कहकर नन्दरानी भक्तिभावसे मुनिके सामने खड़ी हो गयीं। उस सतीने नन्दरायजीको बुलानेके लिये चर भेजा। यशोदाजीकी पूर्वोक्त बातें सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे। उनके शिष्य-समूह भी हास्यकी छटासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए जोर-जोरसे हँस पड़े। तब उन शुद्धबुद्धि महामुनि गर्गने यथार्थ हितकर, नीतियुक्त एवं अत्यन्त आनन्ददायक बात कही।
श्रीगर्गजी बोले—देवि! तुम्हारा यह समयोचित वचन अमृतके समान मधुर है। जिसका जिस कुलमें जन्म होता है, उसका स्वभाव भी वैसा ही होता है। समस्त गोपरूपी कमलवनोंके विकासके लिये गोपराज गिरिभानु सूर्यके समान हैं। उनकी पत्नीका नाम सती पद्मावती है, जो साक्षात् पद्मा (लक्ष्मी)-के समान हैं। उन्हींकी कन्या तुम यशोदा हो, जो अपने यशकी वृद्धि करनेवाली हो। भद्रे! नन्द और तुम जो कुछ भी हो, वह मुझे ज्ञात है। यह बालक जिस प्रयोजनसे भूतलपर अवतीर्ण हुआ है, वह सब मैं जानता हूँ। निर्जन स्थानमें नन्दके समीप मैं सब बातें बताऊँगा। मेरा नाम गर्ग है। मैं