भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 810 में से

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पृष्ठ 485

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७५ हुआ है, उसे बताता हूँ; सुनो। माघ शुक्ल चतुर्दशीकी शुभ बेलामें इन बालकोंका संस्कार करो। उस दिन गुरुवार है। रेवती नक्षत्र है। चन्द्र और तारा शुद्ध हैं। मीनके चन्द्रमा हैं। उसपर लग्नेशकी पूर्ण दृष्टि है। उत्तम वणिज नामक करण है और मनोहर शुभ योग है। वह दिन परम दुर्लभ है। उसमें सभी उत्कृष्ट एवं उपयोगी योगोंका उदय हुआ है। अतः पण्डितोंके साथ विचार करके उसी दिन प्रसन्नतापूर्वक संस्कार- कर्मका सम्पादन करो। ऐसा कह मुनीश्वर गर्ग बाहर आकर बैठ गये। नन्द और यशोदाको बड़ा हर्ष हुआ और वे संस्कार-कर्मके लिये तैयारी करने लगे। इसी समय गर्गजीको देखनेके लिये गोप-गोपियाँ और बालक-बालिकाएँ नन्दभवनमें आयीं। उन्होंने देखा - मुनिश्रेष्ठ गर्ग मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। शिष्यसमूहोंसे घिरकर ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे हैं और प्रश्न पूछनेवाले किसी सिद्धपुरुषको वे प्रसन्नतापूर्वक गूढ़योगका रहस्य समझा रहे हैं। नन्दभवनकी एक-एक सामग्रीको मुस्कराते हुए देख रहे हैं और योगमुद्रा धारण किये स्वर्णसिंहासनपर बैठे हैं। ज्ञानमयी दृष्टिसे भूत, वर्तमान और भविष्यको भी देख रहे हैं। वे मन्त्रके प्रभावसे अपने हृदयमें परमात्माके जिस सिद्ध स्वरूपको देखते हैं, उसीको मुस्कराते हुए शिशुके रूपमें बाहर यशोदाकी गोदमें देख रहे हैं। महेश्वरके बताये हुए ध्यानके अनुसार जिस रूपका उन्हें साक्षात्कार हुआ था, उसी पूर्णकाम परमात्मस्वरूपका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक दर्शन करके नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वे पुलकित शरीरसे भक्तिके सागरमें निमग्न दिखायी देते थे। योगचर्याके अनुसार मन-ही-मन भगवान्की पूजा और प्रणाम करते थे। गोप-गोपियोंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और गर्गजीने भी उन सबको आशीर्वाद दिया। तदनन्तर मुनि अपने आसनपर विराजमान हुए और वे समागत स्त्री-पुरुष अपने-अपने घरको गये। नन्दने आनन्दित होकर निकटवर्ती तथा दूरवर्ती बन्धुजनोंके पास शीघ्र ही मङ्गलपत्रिका पठायी। इसके बाद उन्होंने दूध, दही, घी, गुड़, तेल, मधु, माखन, तक्र और चीनीके शर्बतसे भरी हुई बहुत-सी नहरें लीलापूर्वक तैयार करायीं। इसके बाद उन्होंने अगहनीके चावलोंके सौ ऊँचे-ऊँचे पर्वताकार ढेर लगवाये। चिउरोंके सौ पर्वत, नमकके सात, शर्कराके भी सात, लड्डुओंके सात तथा पके फलोंके सोलह पर्वत खड़े कराये। जौ, गेहूँके आटेके पके हुए लड्डुक, पिण्ड, मोदक तथा स्वस्तिक (मिष्टान्न- विशेष) -के अनेक पर्वत खड़े किये गये थे। कपर्दकोंके बहुत ही ऊँचे-ऊँचे सात पर्वत खड़े दिखायी देते थे। कर्पूर आदिसे युक्त ताम्बूलके बीडोंसे घर भरा हुआ था। सुवासित जलके चौड़े-चौड़े कुण्ड भरे गये थे, जिनमें चन्दन, अगुरु और केसर मिलाये गये थे। नन्दजीने कौतूहलवश नाना प्रकारके रत्न, भाँति-भाँतिके सुवर्ण, रमणीय मोती-मूँगे, अनेक प्रकारके मनोहर वस्त्र और आभूषण भी पुत्रके अन्न- प्राशन-संस्कारके लिये संचित किये थे। आँगनको झाड़-बुहारकर सुन्दर बनाया गया। उसमें चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया। केलेके खंभों, आमके नये पल्लवोंकी बन्दनवारों और महीन वस्त्रोंसे उस आँगनको कौतुकपूर्वक सब ओरसे घेर दिया गया। यथास्थान मङ्गल-कलश स्थापित किये गये। उन्हें फलों और पल्लवोंसे सजाया गया तथा चन्दन, अगुरु, कस्तूरी एवं फूलोंके गजरोंसे सुशोभित किया गया। सुन्दर पुष्पहारों और मनोहर वस्त्रोंकी राशियोंसे नन्द-भवनके आँगनको सजाया गया था। उसमें गौओं, मधुपर्कों, आसनों, फलों और सजल कलशोंके

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