भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 488
४७८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

आपका दिया हुआ यह धन भी नहीं लूँगा। मुझ अनुरागी सेवकको अपने चरणकमलोंकी सेवामें रख लीजिये।

इस प्रकार स्तुति करके गर्गजी नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए श्रीहरिके चरणोंमें गिर पड़े और जोर-जोरसे रोने लगे। उस समय भक्तिके उद्रेकसे उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। गर्गजीकी बात सुनकर भक्तवत्सल श्रीकृष्ण हँस पड़े और बोले—'मुझमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो।'

जो मनुष्य गर्गजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति, दास्यभाव और उनकी स्मृतिका सौभाग्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं, वह श्रीकृष्णभक्तोंकी सेवामें तत्पर हो जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और मोह आदिके संकटसे पार हो जाता है। श्रीकृष्णके साथ रहकर सदा आनन्द भोगता है और श्रीहरिसे कभी उसका वियोग नहीं होता।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति करके गर्गमुनिने उन्हें नन्दजीको दे दिया और प्रशंसापूर्वक कहा—'गोपराज! अब मैं घर जाता हूँ, आज्ञा दो। अहो! कैसी विचित्र बात है कि संसार मोहजालसे जकड़ा हुआ है। जैसे समुद्रमें फेन उठता और मिटता रहता है, उसी प्रकार इस भवसागरमें मनुष्योंको संयोग और वियोगका अनुभव होता रहता है।'

गर्गकी यह बात सुनकर नन्दजी उदास हो गये; क्योंकि साधु पुरुषोंके लिये सत्पुरुषोंका वियोग मरणसे भी अधिक कष्टदायक होता है। सम्पूर्ण शिष्योंसे घिरे हुए मुनिवर गर्ग जब जानेको उद्यत हुए, तब रोते हुए नन्द आदि सब गोप-गोपियोंने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया। उन सबको आशीर्वाद देकर मुनिश्रेष्ठ गर्ग सानन्द मथुराको पधारे। ऋषि-मुनि तथा प्रिय बन्धुवर्ग सभी धनसे सम्पन्न हो प्रसन्न-मनसे अपने-अपने घरोंको गये। समस्त बन्दीजन भी पूर्णमनोरथ होकर अपने घरको लौट गये। उन सबको मीठे पदार्थ, वस्त्र, उत्तम श्रेणीके अश्व तथा सोनेके आभूषण प्राप्त हुए थे। आकण्ठ भोजन करके तृप्त हुए भिक्षुकगण बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने घरको लौटे। वे सुवर्ण और वस्त्रोंके भारी भारसे थककर चलनेमें असमर्थ हो गये थे। कोई धीरे-धीरे चलते, कोई विश्रामके लिये धरतीपर सो जाते और कुछ लोग मार्गमें उठते-बैठते जाते थे। कोई वहाँ सानन्द हँसते हुए टिक जाते थे। कपर्दकों तथा अन्य वस्तुओंके जो बहुत-से शेष भाग बच गये थे, उन्हें कुछ लोग ले लेते थे। कुछ लोग खड़े हो दूसरोंको वे वस्तुएँ दिखाते थे। कुछ लोग नृत्य करते थे और कितने ही लोग वहाँ गीत गाते थे। कोई नाना प्रकारकी प्राचीन गाथाएँ कहते थे। राजा मरुत्त, श्वेत, सगर, मान्धाता, उत्तानपाद, नहुष और नल आदिकी जो कथाएँ हैं, उन्हें सुनाते थे। श्रीरामके अश्वमेधयज्ञकी तथा राजा रन्तिदेवके दान-कर्मकी भी गाथाएँ गाते थे। कोई ठहर-ठहरकर और कोई सो-सोकर यात्रा करते थे। इस प्रकार सब लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरोंको गये। हर्षसे भरे हुए नन्द और यशोदा दोनों दम्पति बालकृष्णको गोदमें लेकर कुबेरभवनके समान रमणीय अपने भव्य भवनमें रहने लगे। इस प्रकार वे दोनों बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी कलाकी भाँति बढ़ने लगे। अब वे गौओंकी पूँछ और दीवाल पकड़कर खड़े होने लगे। प्रतिदिन आधा शब्द या चौथाई शब्द बोल पाते थे। मुने! आँगनमें चलते हुए वे दोनों भाई माता-पिताका हर्ष बढ़ाने लगे। अब बालक श्रीहरि दो-एक पग चलनेमें समर्थ हो गये। घरमें और आँगनमें वे घुटनोंके बलसे चलने-फिरने लगे। संकर्षणकी अवस्था बालक श्रीकृष्णसे एक साल अधिक थी। वे दोनों भाई माता-पिताका आनन्दवर्धन करते हुए दिन-दिन बड़े होने लगे।