भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९९ पितरोंकी परम दुर्लभ मानसी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त किया ? व्रजके महान् अधिपति वृषभानु पूर्वजन्ममें कौन थे, किसके पुत्र थे और किस तपस्यासे राधा उनकी कन्या हुईं ? सूतजी कहते हैं- नारदजीकी यह बात सुनकर ज्ञानिशिरोमणि महर्षि नारायण हँसे और प्रसन्नतापूर्वक उस प्राचीन इतिहासको बताने लगे। भगवान् नारायण बोले- नारद ! पूर्वकालमें पितरोंके मानससे तीन कन्याएँ प्रकट हुईं- कलावती, रत्नमाला और मेनका। ये तीनों ही अत्यन्त दुर्लभ थीं। इनमेंसे रत्नमालाने कामनापूर्वक राजा जनकको पतिरूपमें वरण किया और मेनकाने श्रीहरिके अंशभूत गिरिराज हिमालयको अपना पति बनाया। रत्नमालाकी पुत्री अयोनिजा सती सत्यपरायणा सीता हुईं, जो साक्षात् लक्ष्मी तथा श्रीरामकी पत्नी थीं। मेनकाकी पुत्री पार्वती हुईं, जो पूर्वजन्ममें सती नामसे प्रसिद्ध थीं। वे भी अयोनिजा ही कही गयी हैं। पार्वती श्रीहरिकी सनातनी माया हैं। उन्होंने तपस्यासे नारायणस्वरूप महादेवजीको पतिरूपमें प्राप्त किया है। कलावतीने मनुवंशी राजा सुचन्द्रका वरण किया। वे राजा साक्षात् श्रीहरिके अंश थे। उन्होंने कलावतीको पाकर अपनेको गुणवानोंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त सुन्दर माना। वे उसके सौन्दर्यकी प्रशंसा करते हुए मन-ही-मन कहते थे- 'इसका रूप अद्भुत है। वेष भी आश्चर्यजनक है और इसकी नयी अवस्था कैसी विलक्षण है। सुकोमल अङ्ग, शरत्कालके चन्द्रमासे भी बढ़कर परम सुन्दर मुख तथा गज और खंजनके भी गर्वका गंजन करनेवाली दुर्लभ गति-सभी अद्भुत हैं।' इस अपनी परम सुन्दरी पत्नी कलावतीके साथ विभिन्न रमणीय स्थानोंमें रहकर सुदीर्घकालतक विहार करनेके पश्चात् राजा भोगोंसे विरक्त हो गये और कलावतीको साथ लेकर विन्ध्यपर्वतकी तीर्थभूमिमें तपस्याके लिये चले गये। भारतमें अत्यन्त प्रशंसाके योग्य वह उत्तम स्थान पुलहाश्रमके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ राजाने मोक्षकी इच्छा मनमें लेकर सहस्र दिव्य वर्षोंतक तप किया। उनके मनमें कोई लौकिक कामना नहीं थी। वे आहार छोड़ देनेके कारण कृशोदर हो गये। श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते-करते मुनिश्रेष्ठ सुचन्द्रको मूर्च्छा आ गयी। उनके शरीरपर जो बाँबी छा गयी थी, उसे उनकी साध्वी पत्नीने दूर किया। पतिको निश्चेष्ट, प्राणशून्य, मांस और रक्तसे रहित तथा अस्थि- चर्मावशिष्टमात्र देख उस निर्जन वनमें कलावती शोकातुर हो उच्च स्वरसे रोने लगी। मूर्च्छित पतिको वक्षःस्थलसे लगाकर वह महादीना पतिव्रता 'हे नाथ! हा नाथ!' का उच्चारण करती हुई विलाप करने लगी। राजा आहार छोड़ देनेके कारण सूख गये हैं; उनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं- यह देख और कलावतीका विलाप सुनकर कृपानिधान कमलजन्मा जगत्स्रष्टा ब्रह्माजी कृपापूर्वक वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने तुरंत ही राजाके शरीरको अपनी गोदमें लेकर कमण्डलुके जलसे सींचा। फिर ब्रह्मज्ञ ब्रह्माने ब्रह्मज्ञानके द्वारा उसमें जीवका संचार किया। इससे चेतनाको प्राप्त हो नृपवर सुचन्द्रने अपने सामने प्रजापतिको देखकर प्रणाम किया। प्रजापतिने कामके समान कान्तिमान् नरेशसे संतुष्ट होकर कहा- 'राजन् ! तुम इच्छानुसार वर माँगो।' विधाताकी यह बात सुनकर श्रीमान् सुचन्द्रके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल गयी। वे प्रसन्नवदन हो बोले- 'दयानिधे ! यदि आप वर देनेको उद्यत हैं तो कृपापूर्वक मुझे मनोवाञ्छित निर्वाण प्रदान करें।' इस वरदानके मिल जानेपर मेरी क्या दशा होगी, इसका मन-ही-मन अनुमान करके कलावतीके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वह सती संत्रस्त हो वर देनेको उद्यत हुए विधातासे बोली। कलावतीने कहा- कमलोद्भव ब्रह्मन् ! यदि