भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 516
५०६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

स्थलपर उस अवस्थामें भी सुन्दरी तुलसी निरन्तर स्थित रहने लगी। मुने! तुलसीका सारा चरित्र तुमसे विस्तारपूर्वक कहा जा चुका है, तथापि यहाँ प्रसङ्गवश पुनः उसकी कुछ चर्चा की गयी। तपोधन! उस तुलसीकी तपस्याका एक यह भी स्थान है; इसलिये इसे मनीषी पुरुष 'वृन्दावन' कहते हैं। (तुलसी और वृन्दा समानार्थक शब्द है) अथवा मैं तुमसे दूसरा उत्कृष्ट हेतु बता रहा हूँ, जिससे भारतवर्षका यह पुण्यक्षेत्र वृन्दावनके नामसे प्रसिद्ध हुआ। राधाके सोलह नामोंमें एक वृन्दा नाम भी है, जो श्रुतिमें सुना गया है। उन वृन्दा नामधारिणी राधाका यह रमणीय क्रीडा-वन है; इसलिये इसे 'वृन्दावन' कहा गया है। पूर्वकालमें श्रीकृष्णने श्रीराधाकी प्रीतिके लिये गोलोकमें वृन्दावनका निर्माण किया था। फिर भूतलपर उनकी क्रीडाके लिये प्रकट हुआ वह वन उस प्राचीन नामसे ही 'वृन्दावन' कहलाने लगा।

नारदजीने पूछा— जगद्गुरो! श्रीराधिकाके सोलह नाम कौन-कौन-से हैं? मुझ शिष्यसे उन्हें बताइये; उन्हें सुननेके लिये मेरे मनमें उत्कण्ठा है। मैंने सामवेदमें वर्णित श्रीराधाके सहस्र नाम सुने हैं; तथापि इस समय आपके मुखसे उनके सोलह नामोंको सुनना चाहता हूँ। विभो! वे सोलह नाम उन सहस्र नामोंके ही अन्तर्गत हैं या उनसे भिन्न हैं? अहो! उन भक्तवाञ्छित पुण्यस्वरूप नामोंका मुझसे वर्णन कीजिये। साथ ही उन सबकी व्युत्पत्ति भी बताइये। जगत्के आदिकारण! जगन्माता श्रीराधाके उन सर्वदुर्लभ पावन नामोंको मैं सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायणने कहा— राधा, रासेश्वरी, रासवासिनी, रसिकेश्वरी, कृष्णप्राणाधिका, कृष्णप्रिया, कृष्णस्वरूपिणी, कृष्णवामाङ्गसम्भूता, परमानन्दरूपिणी, कृष्णा, वृन्दावनी, वृन्दा, वृन्दावनविनोदिनी, चन्द्रावली, चन्द्रकान्ता और शरच्चन्द्रप्रभानना—ये सारभूत सोलह नाम उन सहस्र नामोंके ही अन्तर्गत हैं। राधा शब्दमें 'धा' का अर्थ है संसिद्धि (निर्वाण) तथा 'रा' दानवाचक है। जो स्वयं निर्वाण (मोक्ष) प्रदान करनेवाली हैं; वे 'राधा' कही गयी हैं। रासेश्वरकी ये पत्नी हैं; इसलिये इनका नाम 'रासेश्वरी' है। उनका रासमण्डलमें निवास है; इससे वे 'रासवासिनी' कहलाती हैं। वे समस्त रसिक देवियोंकी परमेश्वरी हैं; अतः पुरातन संत-महात्मा उन्हें 'रसिकेश्वरी' कहते हैं। परमात्मा श्रीकृष्णके लिये वे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतमा हैं; अतः साक्षात् श्रीकृष्णने ही उन्हें 'कृष्णप्राणाधिका' नाम दिया है। वे श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया कान्ता हैं अथवा श्रीकृष्ण ही सदा उन्हें प्रिय हैं; इसलिये समस्त देवताओंने उन्हें 'कृष्णप्रिया' कहा है। वे श्रीकृष्णरूपको लीलापूर्वक निकट लानेमें समर्थ हैं तथा सभी अंशोंमें श्रीकृष्णके सदृश हैं; अतः 'कृष्णस्वरूपिणी' कही गयी हैं। परम सती श्रीराधा श्रीकृष्णके आधे वामाङ्गभागसे प्रकट हुई हैं; अतः श्रीकृष्णने स्वयं ही उन्हें 'कृष्णवामाङ्गसम्भूता' कहा है। सती श्रीराधा स्वयं परमानन्दकी मूर्तिमती राशि हैं; अतः श्रुतियोंने उन्हें 'परमानन्दरूपिणी' की संज्ञा दी है। 'कृष्' शब्द मोक्षका वाचक है, 'ण' उत्कृष्टताका बोधक है और 'आकार' दाताके अर्थमें आता है। वे उत्कृष्ट मोक्षकी दात्री हैं; इसलिये 'कृष्णा' कही गयी हैं। वृन्दावन उन्हींका है; इसलिये वे 'वृन्दावनी' कही गयी हैं अथवा वृन्दावनकी अधिदेवी होनेके कारण उन्हें यह नाम प्राप्त हुआ है। सखियोंके समुदायको 'वृन्द' कहते हैं और 'अकार' सत्ताका वाचक है। उनके समूह-की-समूह सखियाँ हैं; इसलिये वे 'वृन्दा' कही गयी हैं। उन्हें सदा वृन्दावनमें विनोद प्राप्त होता है; अतः वेद उनको 'वृन्दावनविनोदिनी' कहते हैं।