भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 529

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१९ नेत्रोंके विषय हो रहे हैं। प्रभो! आप तो भक्तोंके अनुरोधसे साकार रूपमें प्रकट हुए हैं; अन्यथा आपको शरीरकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? सगुण-साकार तथा निर्गुण-निराकार भी आप ही हैं। आप स्वेच्छामय, सबके आवासस्थान तथा समस्त चराचर जगत्के सनातन बीज हैं। सबके ईश्वर, साक्षी, आत्मा और सर्वरूपधारी हैं। ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म और इन्द्र आदि देवता तथा वेदों और वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी जिन परमेश्वरकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापी प्रभुका स्तवन क्या एक सर्प कर सकेगा? हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! आप मुझ अधमको क्षमा कीजिये। श्रीकृष्ण! मैंने अपने खल स्वभाव और अज्ञानके कारण आपको चबा डालनेका प्रयत्न किया; परंतु आप तो आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक तथा अमूर्त हैं; अतः किसी भी अस्त्रके लक्ष्य नहीं हैं। न तो आपका अन्त देखा जा सकता है और न लाँघा ही जा सकता है। न तो कोई आपका स्पर्श कर सकता है और न आपपर आवरण ही डाल सकता है। आप स्वयं प्रकाशरूप हैं। ऐसा कहकर नागराज कालिय भगवान्के चरणकमलोंमें गिर पड़ा। भगवान् उसपर संतुष्ट हो गये। उन्होंने 'एवमस्तु' कहकर उसे सम्पूर्ण अभीष्ट वर दे दिया। जो नागराजद्वारा किये गये स्तोत्रका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजोंको कभी नागोंसे भय नहीं होता। वह भूतलपर नागोंकी शय्या बनाकर सदा उसपर शयन कर सकता है। उसके भोजनमें विष और अमृतका भेद नहीं रह जाता। जिसको नागने ग्रस लिया हो, काट खाया हो अथवा विषैला भोजन करनेसे जिसके प्राणान्तकी सम्भावना हो गयी हो, वह मनुष्य भी इस स्तोत्रको सुननेमात्रसे स्वस्थ हो जाता है। जो इस स्तोत्रको भोजपत्रपर लिखकर भक्तिभावसे युक्त हो कण्ठमें या दाहिने हाथमें धारण करता है, उसे भी नागोंसे भय नहीं होता। जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है, वहाँ कोई नाग नहीं ठहरता। निश्चय ही उस घरमें विष, अग्नि तथा वज्रका भय नहीं प्राप्त होता। इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति और स्मृति उसे सदा सुलभ होती है तथा अन्तमें अपने कुलको पवित्र करके निश्चय ही वह श्रीकृष्णका दास्यभाव प्राप्त कर लेता है। भगवान् नारायण कहते हैं-नारद! नागराजको अभीष्ट वर देकर जगदीश्वर श्रीहरिने पुनः उससे मधुर वचन कहे, जो परिणाममें सुख देनेवाले थे। श्रीकृष्ण बोले-नागराज! तुम यमुना- जलके मार्गसे ही परिवारसहित रमणकद्वीपमें चले जाओ। वह स्थान इन्द्रनगरके समान श्रेष्ठ एवं सुन्दर है। श्रीहरिकी यह आज्ञा सुनकर नाग प्रेमविह्वल होकर रोने लगा और बोला- 'नाथ ! मैं आपके चरणकमलोंका कब दर्शन करूँगा?' वह महेश्वर श्रीकृष्णको सैकड़ों बार प्रणाम करके स्त्री और परिवारके साथ जलके ही मार्गसे चला गया। जाते समय नागराज भगवद्-विरहसे व्याकुल हो रहा था। उसके चले जानेके बाद यमुनाके उस कुण्डका जल अमृतके समान हो गया। इससे समस्त जन्तुओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। नारद! रमणकमें पहुँचकर कालियने इन्द्रनगरके समान सुन्दर भवन देखा। कृपासिन्धु श्रीकृष्णकी आज्ञासे साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था। वहाँ नागराज कालिय अपनी पत्नी और पुत्रोंके साथ श्रीहरिके चिन्तनमें तत्पर हो भय छोड़कर बड़े हर्षके साथ रहने लगा। इस प्रकार श्रीहरिका सारा अद्भुत, सुखदायक, मोक्षप्रद तथा सारभूत चरित्र मैंने कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो? सूतजी कहते हैं-महर्षि नारायणका उपर्युक्त