ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२७
स्तोत्रका प्रतिदिन भक्तिभावसे पाठ करता है, वह इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके धाममें जाता है। वहाँ उसे अनुपम दास्यसुख तथा उन परमेश्वरके निकट स्थान प्राप्त होता है। श्रीकृष्णका सांनिध्य पाकर वह पार्षदशिरोमणि बन जाता है।
भगवान् नारायण कहते हैं—तदनन्तर जगत्-विधाता ब्रह्मा जब ब्रह्मलोकमें चले गये, तब भगवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ अपने घरको गये। उस दिन गौओं, बछड़ों और ग्वालबालोंने एक वर्षके बाद अपने घरपर पदार्पण किया था; किंतु श्रीकृष्णकी मायासे उन सबने उस एक वर्षके अन्तरको एक दिनका ही अन्तर समझा। गोप और गोपियाँ उस समय कुछ भी अनुमान न लगा सकीं। (पहलेके मायारचित बालकोंमें और आजके वास्तविक बालकोंमें उन्हें कोई अन्तर नहीं जान पड़ा।) योगीके लिये तो क्या नया और क्या पुराना, सारा जगत् कृत्रिम ही है। इस प्रकार श्रीकृष्णका यह सारा शुभ चरित्र कहा गया—जो सुखद, मोक्षप्रद, पुण्यमय तथा सर्वकालमें सुख देनेवाला है।
(अध्याय २०)
नन्दद्वारा इन्द्रयागकी तैयारी, श्रीकृष्णद्वारा इसके विषयमें जिज्ञासा, नन्दजीका उत्तर और श्रीकृष्णद्वारा प्रतिवाद, श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार इन्द्रका यजन न करके गोपोंद्वारा ब्राह्मणों और गिरिराजका पूजन, उत्सवकी समाप्तिपर इन्द्रका कोप, नन्दद्वारा इन्द्रकी स्तुति, श्रीकृष्णका नन्दको इन्द्रकी स्तुतिसे रोककर सब व्रजवासियोंको गौओंसहित गोवर्धनकी गुफामें स्थापित करके पर्वतको छातेके डंडेकी भाँति उठा लेना; इन्द्र, देवताओं तथा मेघोंका स्तम्भन कर देना, पराजित इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णका उन्हें विदा करके पर्वतको स्थापित कर देना तथा नन्दद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन
भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! एक दिन आनन्दयुक्त नन्दने व्रजमें इन्द्रयज्ञकी तैयारी करके सब ओर ढिंढोरा पिटवाया। उस समय सबको यह संदेश दिया गया कि जो-जो इस नगरमें गोप, गोपी, बालक, बालिका, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र निवास करते हैं; वे सब लोग भक्तिपूर्वक दही, दूध, घी, तक्र, माखन, गुड़ और मधु आदि सामग्री लेकर इन्द्रकी पूजा करें। इस प्रकार घोषणा कराकर उन्होंने स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक सुविस्तृत रमणीय स्थानमें यष्टिका-आरोपण किया (ध्वजाके लिये बाँस गड़वाया)। उसमें रेशमी वस्त्र और मनोहर मालाएँ लगवायीं। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुङ्कुमके द्रवसे उस यष्टिको चर्चित किया गया। नन्दजीने स्नान और नित्यकर्म करके भक्तिभावसे दो धुले हुए वस्त्र धारण किये तथा पैर धोकर वे सोनेके पीढ़ेपर बैठे। उस समय नाना प्रकारके पात्रोंके साथ ब्राह्मण, पुरोहित, गोप, गोपी, बालिका तथा बालक उपस्थित हुए। इसी बीचमें वहाँ नगरनिवासी भी बहुत सामान एकत्र करके अनेक प्रकारकी भेंट-पूजा लिये आ पहुँचे। तदनन्तर ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान, वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् एवं शान्त-स्वभाव—गर्ग, जैमिनि, कृष्णद्वैपायन आदि बहुत-से मुनिगण शिष्योंसहित वहाँ पधारे। और भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, बन्दी, भिक्षुक आदि आये। गोपराज नन्दने उठकर सभीका यथायोग्य प्रणामादिद्वारा स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् यष्टिके समीप ही निपुण रसोइया ब्राह्मण