ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 546, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
सुशोभित होते हैं; आपको नमस्कार है। आप योगी, योगरूप और योगियोंके भी गुरु हैं। सिद्धेश्वर, सिद्ध एवं सिद्धोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, शेषनाग, धर्म, सूर्य, गणेश, षडानन, सनकादि समस्त मुनि, सिद्धेश्वरोंके गुरुके भी गुरु कपिल तथा नर-नारायण ऋषि भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं; उन परात्पर प्रभुका स्तवन दूसरे कौन-से जडबुद्धि प्राणी कर सकते हैं? वेद, वाणी, लक्ष्मी, सरस्वती तथा राधा भी जिनकी स्तुति नहीं कर सकतीं; उन्हींका स्तवन दूसरे विद्वान् पुरुष क्या कर सकते हैं? ब्रह्मन्! मुझसे क्षण-क्षणमें जो अपराध बन रहा है, वह सब आप क्षमा करें। करुणासिन्धो! दीनबन्धो! भवसागरमें पड़े हुए मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये। प्रभो! पूर्वकालमें तीर्थस्थानमें तपस्या करके मैंने आप सनातनपुरुषको पुत्ररूपमें प्राप्त किया है। अब आप मुझे अपने चरण-कमलोंकी भक्ति और दास्य प्रदान कीजिये। ब्रह्मत्व, अमरत्व अथवा सालोक्य आदि चार प्रकारके मोक्ष आपके चरणकमलोंकी दास्य-भक्तिकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं; फिर इन्द्रपद, देवपद, सिद्धि-प्राप्ति, स्वर्गप्राप्ति, राजपद तथा चिरंजीवित्वको विद्वान् पुरुष किस गिनतीमें रखते हैं? (क्या समझते हैं?) ईश्वर! यह सब जो पूर्वकथित ब्रह्मत्व आदि पद हैं, वे आपके भक्तके आधे क्षणके लिये प्राप्त हुए सङ्गकी क्या समानता कर सकते हैं! कदापि नहीं। जो आपका भक्त है, वह भी आपके समान हो जाता है। फिर आपके महत्त्वका अनुमान कौन लगा सकता है? आपका भक्त आधे क्षणके वार्तालापमात्रसे किसीको भी भवसागरसे पार कर सकता है। आपके भक्तोंके सङ्गसे भक्तिका विविध अङ्कुर अवश्य उत्पन्न होता है। उन हरिभक्तरूप मेघोंके द्वारा की गयी वार्तालापरूपी जलकी वर्षासे सींचा जाकर भक्तिका वह अङ्कुर बढ़ता है। जो भगवान्के भक्त नहीं हैं, उनके आलापरूपी तापसे वह अङ्कुर तत्काल सूख जाता है और भक्त एवं भगवान्के गुणोंकी स्मृतिरूपी जलसे सींचनेपर वह उसी क्षण स्पष्टरूपसे बढ़ने लगता है। उनमें उत्पन्न आपकी भक्तिका अङ्कुर जब प्रकट होकर भलीभाँति बढ़ जाता है, तब वह नष्ट नहीं होता। उसे प्रतिदिन और प्रतिक्षण बढ़ाते रहना चाहिये। तदनन्तर उस भक्तको ब्रह्मपदकी प्राप्ति कराकर भी उसके जीवनके लिये भगवान् उसे अवश्य ही परम उत्तम दास्यरूप फल प्रदान करते हैं। यदि कोई दुर्लभ दास्यभावको पाकर भगवान्का दास हो गया तो निश्चय ही उसीने समस्त भय आदिको जीता है।
यों कहकर नन्द श्रीहरिके सामने भक्तिभावसे खड़े हो गये। तब प्रसन्न हुए श्रीकृष्णने उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। इस प्रकार नन्दद्वारा किये गये स्तोत्रका जो भक्तिभावसे प्रतिदिन पाठ करता है, वह शीघ्र ही श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है। जब द्रोण नामक वसुने अपनी पत्नी धराके साथ तीर्थमें तपस्या की, तब ब्रह्माजीने उन्हें यह परम दुर्लभ स्तोत्र प्रदान किया था। सौभरिमुनिने पुष्करमें संतुष्ट होकर ब्रह्माजीको श्रीहरिका षडक्षर-मन्त्र तथा सर्वरक्षणकवच प्रदान किया था। वही कवच, वही स्तोत्र और वही परम दुर्लभ मन्त्र ब्रह्माके अंशभूत गर्गमुनिने तपस्यामें लगे हुए नन्दको दिया था। पूर्वकालमें जिसके लिये जो मन्त्र, स्तोत्र, कवच, इष्टदेव, गुरु और विद्या प्राप्त होती है, वह पुरुष उस मन्त्र आदि तथा विद्याको निश्चय ही नहीं छोड़ता है। इस प्रकार यह श्रीकृष्णका अद्भुत आख्यान और स्तोत्र कहा गया, जो सुखद, मोक्षप्रद, सब साधनोंका सारभूत तथा भवबन्धनको छुटकारा दिलानेवाला है। (अध्याय २१)