भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 548

५३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दिया। वे बोले—'हे करुणानिधान कृष्ण! आओ हमारी रक्षा करो। हे संकर्षण! हमें बचाओ, नहीं तो इस दानवके हाथसे अब हमारे प्राण जा रहे हैं। हे कृष्ण! हे कृष्ण! हरे! मुरारे! गोविन्द! दामोदर! दीनबन्धो! गोपीश! गोपेश! अनन्त! नारायण! भवसागरमें डूबते हुए हमलोगोंकी रक्षा करो, रक्षा करो। दीननाथ! भय-अभयमें, शुभ-अशुभ अथवा सुख और दुःखमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई हमें शरण देनेवाला नहीं है। हे माधव! भवसागरमें हमारी रक्षा करो, रक्षा करो। गुणसागर श्रीकृष्ण! तुम्हीं भक्तोंके एकमात्र बन्धु हो। हम बालक बहुत भयभीत हैं। हमारी रक्षा करो, रक्षा करो। यह दानव-कुलका स्वामी हमारा काल बनकर आ पहुँचा है। आप इसका वध कीजिये और इसे मारकर देवताओंके बल-दर्पको बढ़ाइये।'

बालकोंकी व्याकुलता देखकर भयहन्ता भक्तवत्सल माधव बलरामजीके साथ उस स्थानपर आये, जहाँ वे बालक खड़े थे। 'कोई भय नहीं है, कोई भय नहीं है'—यों कहकर वे शीघ्रतापूर्वक उनके पास दौड़े आये और मन्द मुस्कानसे युक्त प्रसन्नमुखद्वारा उन्होंने उन बालकोंको अभय दान दिया। श्रीकृष्ण और बलरामको देखकर बालक हर्षसे नाचने लगे। उनका भय दूर हो गया। क्यों न हो, भगवान्‌की स्मृति ही अभयदायिनी तथा सब प्रकारसे मङ्गल प्रदान करनेवाली है। बालकोंको निगल जानेको उद्यत हुए उस दानवको देख मधुसूदन श्रीकृष्णने महाबली बलरामको सम्बोधित करके कहा।

श्रीकृष्ण बोले— भैया! यह दानव राजा बलिका बलवान् पुत्र है। इसका नाम साहसिक है। पूर्वकालमें दुर्वासाने इसे शाप दिया था। उस ब्रह्मशापसे ही यह गदहा हुआ है। यह बड़ा पापी तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है; अतः मेरे ही हाथसे वधके योग्य है। मैं इसका वध करूँगा। तुम बालकोंकी रक्षा करो। सब बालकोंको लेकर दूर चले जाओ।

तब बलराम उन बालकोंको लेकर श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार शीघ्र ही दूर चले गये। इधर इस महाबली एवं महापराक्रमी दानवराजने श्रीकृष्णपर दृष्टि पड़ते ही उन्हें रोषपूर्वक अनायास ही निगल लिया। श्रीकृष्ण प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान थे। उन्हें निगल लेनेपर उस दानवके भीतर बड़ी जलन होने लगी। उनके अतिशय तेजसे वह मरणासन्न हो गया। तब उस दैत्यने भयभीत हो उन तेजस्वी प्रभुको फिर उगल दिया। परित्यक्त होनेपर उन परमेश्वरकी ओर एकटक दृष्टिसे देखता हुआ वह दैत्य मोहित हो गया। भगवान्‌का श्रीविग्रह अत्यन्त सुन्दर, शान्त तथा ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान था। श्रीकृष्णके दर्शनमात्रसे उस दानवको पूर्वजन्मकी स्मृति हो आयी। उसने अपने-आपको तथा जगत्‌के परम कारण श्रीकृष्णको भी पहचान लिया। उन तेजःस्वरूप ईश्वरको देखकर वह दानव शास्त्रके अनुसार श्रुतिसे परे गुणातीत प्रभुका जिस प्रकार जन्म हुआ, उसे दृष्टिमें लाकर उनकी स्तुति करने लगा।

दानव बोला— प्रभो! आप ही अपने अंशसे वामन हुए थे और मेरे पिताके यज्ञमें याचक बने थे। आपने पहले तो हमारे राज्य और लक्ष्मीको हर लिया। पर पुनः बलिकी भक्तिके वशीभूत होकर हम सब लोगोंको सुतललोकमें स्थान दिया। आप महान् वीर, सर्वेश्वर और भक्तवत्सल हैं। मैं पापी हूँ और शापसे गर्दभ हुआ हूँ। आप शीघ्र ही मेरा वध कर डालिये। दुर्वासामुनिके शापसे मुझे ऐसा घृणित जन्म मिला है। जगत्पते! मुनिने मेरी मृत्यु आपके हाथसे बतायी थी। आप अत्यन्त तीखे और अतिशय तेजस्वी षोडशार चक्रसे मेरा वध