ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५४६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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समय अपने धर्म—तपस्याको छोड़कर आप क्या करने जा रहे हो? त्रिभुवनमें कौन किसकी पत्नी है और कौन किसका पति? भगवान् श्रीहरि मूर्खोंको बहलानेके लिये मायासे इन सम्बन्धोंकी सृष्टि करते हैं। यह कन्दली आपकी मिथ्या पत्नी थी; इसीलिये अभी क्षणभरमें चली गयी। जो सत्य है, वह कभी तिरोहित नहीं होता। मिथ्या वही है, जिसकी चिरकालतक स्थिति न रहे। वसुदेव-पुत्री एकानंशा, जो श्रीकृष्णकी बहिन है, पार्वतीके अंशसे उत्पन्न हुई है। वह सुशीला और चिरजीविनी है। वह सुन्दरी प्रत्येक कल्पमें आपकी पत्नी होगी; अतः आप कुछ दिनोंतक प्रसन्नतापूर्वक तपस्यामें मन लगाइये। कन्दली इस भूतलपर 'कन्दली' जाति होगी। वह कल्पान्तरमें शुभदा, फलदायिनी, कमनीया, एक संतान देनेवाली, परम दुर्लभा तथा शान्तरूपा स्त्री होकर आपकी पत्नी होगी। जो अत्यन्त उच्छृङ्खल हो, उसका दमन करना उचित ही है; ऐसा श्रुतिमें सुना गया है (अतः उसके भस्म होनेसे आपको शोक नहीं करना चाहिये)।
यों कहकर ब्राह्मणरूपधारी श्रीहरि ब्रह्मर्षि दुर्वासाको ज्ञान दे शीघ्र ही वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब मुनिने सारा भ्रम छोड़कर तपस्यामें मन लगाया। कन्दली इस धरातलपर कन्दली जाति हो गयी। मुने! दैत्य साहसिक तालवनमें जाकर गदहा हो गया और तिलोत्तमा यथासमय बाणासुरकी पुत्री हुई। फिर श्रीहरिके चक्रसे मारा जाकर अपने प्राणोंका परित्याग करके दैत्यराज साहसिकने गोविन्दके उस परम अभीष्ट चरणारविन्दको प्राप्त कर लिया जो मुनिके लिये भी परम दुर्लभ है। तिलोत्तमा भी बाण-पुत्री उषाके रूपमें जन्म ले श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्धके आलिङ्गनसे सफलमनोरथ होकर समयानुसार पुनः अपने निवासस्थान—स्वर्गलोकको चली गयी। इस प्रकार श्रीकृष्णके इस उत्तम लीलोपाख्यानको पितासे सुनकर मैंने तुमसे कहा है। यह पद-पदमें सुन्दर है। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय २४)
महर्षि और्वद्वारा दुर्वासाको शाप, दुर्वासाका अम्बरीषके यहाँ द्वादशीके दिन पारणाके समय पहुँचकर भोजन माँगना, वसिष्ठजीकी आज्ञासे अम्बरीषका पारणाकी पूर्तिके लिये भगवान्का चरणोदक पीना, दुर्वासाका राजाको मारनेके लिये कृत्या-पुरुष उत्पन्न करना, सुदर्शनचक्रका कृत्याको मारकर मुनिका पीछा करना, मुनिका कहीं भी आश्रय न पाकर वैकुण्ठमें जाना, वहाँसे भगवान्की आज्ञाके अनुसार अम्बरीषके घर आकर भोजन करना तथा आशीर्वाद देकर अपने आश्रमको जाना
**नारदजीके पूछनेपर भगवान् श्रीनारायणने कहा—**मुने! महर्षि और्व सरस्वती नदीके तटपर तपस्या कर रहे थे; उन्हें ध्यानसे अपनी पुत्रीके मरणका वृत्तान्त ज्ञात हो गया। तब वे शोकाकुल होकर दुर्वासाके पास आये। दुर्वासाने श्वशुरको प्रणाम करके सब बातें बतायीं और उस घटित घटनाके लिये महान् दुःख प्रकट किया। मुनिवर और्वने दुर्वासाको उलाहना दिया और कहा—'तुमने बहुत थोड़े अपराधपर उसको भारी दण्ड दे दिया। यदि उसे भस्म न करके त्याग ही दिया होता तो वह मेरे ही पास रह जाती।' फिर रोषसे भरकर शाप दे दिया कि 'तुम्हारा पराभव होगा।' इतना कहकर मुनि और्व लौट गये। यह कथा सुनकर नारदजीने दुर्वासाके पराभवका इतिहास पूछा।
**नारद बोले—**भगवन्! दुर्वासा साक्षात्