भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 558

५४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण कुपित हो उठे। उन्होंने राजाके सामने ही अपनी एक जटा तोड़ डाली। उस जटासे शीघ्र ही एक पुरुष प्रकट हुआ, जो अग्निशिखाके समान तेजस्वी था। उसके हाथमें तलवार थी। वह महाभयंकर पुरुष महाराज अम्बरीषको मार डालनेके लिये उद्यत हो गया। यह देख करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान श्रीहरिके सुदर्शनचक्रने उस कृत्या-पुरुषको काट डाला। अब वह बाबा दुर्वासाको भी काटनेके लिये उद्यत हुआ। यह देख विप्रवर दुर्वासा भयसे व्याकुल हो भाग चले। उन्होंने अपने पीछे-पीछे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान तेजस्वी चक्रको आते देखा। वे अत्यन्त व्याकुल हो सारे ब्रह्माण्डका चक्कर लगाते- लगाते थक गये, खिन्न हो गये और ब्रह्माजीको सम्पूर्ण जगत्‌का रक्षक मान उनकी शरणमें गये। 'बचाइये-बचाइये' - पुकारते हुए उन्होंने ब्रह्माजीकी सभामें प्रवेश किया। ब्रह्माजीने उठकर विप्रवर दुर्वासाका कुशल-मङ्गल पूछा। तब उन्होंने आदिसे ही सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया। सुनकर ब्रह्माजीने लम्बी साँस ली और भयसे व्याकुल होकर कहा। ब्रह्माजीने कहा- बेटा! तुम किसके बलपर श्रीहरिके दासको शाप देने गये थे? जिसके रक्षक भगवान् हैं, उसको तीनों लोकोंमें कौन मार सकता है? भक्तवत्सल श्रीहरिने छोटे- बड़े सभी भक्तोंकी रक्षाके लिये सुदर्शनचक्रको सदा नियुक्त कर रखा है। जो मूढ़ श्रीविष्णुके लिये प्राणोंके समान प्रिय वैष्णव भक्तसे द्वेष रखता है, उसका संहार भगवान् विष्णु स्वयं करते हैं। वे श्रीहरि संहारकर्ताका भी संहार करनेमें समर्थ हैं। अतः बेटा! तुम शीघ्र किसी दूसरे स्थानमें जाओ। अब यहाँ तुम्हारी रक्षा नहीं हो सकती। यदि नहीं हटे तो सुदर्शनचक्र मेरे साथ ही तुम्हारा वध कर डालेगा। ब्रह्माजीकी बात सुनकर ब्राह्मणदेवता दुर्वासा वहाँसे भयभीत होकर भागे। अब वे डरकर कैलास पर्वतपर भगवान् शंकरकी शरणमें गये और बोले - 'कृपानिधान! हमारी रक्षा कीजिये।' भगवान् शिव सर्वज्ञ हैं। उन्होंने ब्राह्मण दुर्वासाका कुशल-समाचारतक नहीं पूछा। जो क्षणभरमें जगत्‌का संहार करनेमें समर्थ तथा दीन-दुःखियोंके स्वामी हैं, वे महादेवजी मुनिसे बोले। शंकरजीने कहा - द्विजश्रेष्ठ! सुस्थिर होकर मेरी बात सुनो। मुने! तुम महर्षि अत्रिके पुत्र तथा जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीके पौत्र हो। वेदोंके विद्वान् तथा सर्वज्ञ हो, परंतु तुम्हारा कर्म मूर्खोंके समान है। वेदों, पुराणों और इतिहासोंमें सर्वत्र जिन सर्वेश्वरका निरूपण हुआ है; उन्हींको तुम मूढ़ मनुष्यकी भाँति नहीं जानते हो। जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे मैं, ब्रह्मा, रुद्र, आदित्य, वसु, धर्म, इन्द्र, सम्पूर्ण देवता, मुनीन्द्र और मनु उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं; उन्हीं श्रीहरिके प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भक्तको तुम किसकी शक्तिसे मारने चले थे? उनका चक्र उन्हींके तुल्य तेजस्वी है। उसे रोकना सर्वथा कठिन है। उस चक्रको यद्यपि उन्होंने भक्तोंकी रक्षामें लगा रखा है, तथापि उन्हें उसपर पूरा भरोसा नहीं होता। इसलिये वे स्वयं उनकी रक्षा करनेके लिये जाते हैं। उनके मुँहसे अपने गुणों और नामोंका श्रवण करके उन्हें बड़ा आनन्द मिलता है। इसलिये भगवान् भक्तके साथ सदा छायाकी तरह घूमते रहते हैं। अतः ब्राह्मणदेव! गोविन्दका भजन करो। उनके चरणकमलोंका चिन्तन करो। श्रीहरिके स्मरणमात्रसे भी सारी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। अब शीघ्र ही वैकुण्ठधाममें जाओ। उस धामके अधिपति श्रीहरि ही तुम्हारे शरणदाता हैं। वे प्रभु दयाके सागर हैं; अतः तुम्हें अवश्य ही अभयदान देंगे। ये बातें हो ही रही थीं कि सारा कैलास चक्रके तेजसे व्याप्त हो उठा, जैसे समस्त