ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण एकादशीव्रतका माहात्म्य, इसे न करनेसे हानि, व्रतके सम्बन्धमें आवश्यक निर्णय, व्रतका विधान—छः देवताओंका पूजन, श्रीकृष्णका ध्यान और षोडशोपचार- पूजन तथा कर्ममें न्यूनताकी पूर्तिके लिये भगवान्से प्रार्थना तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर एकादशीका माहात्म्य बताते हुए श्रीनारायणने कहा-मुने ! यह एकादशीव्रत देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। यह श्रीकृष्णप्रीतिका जनक तथा तपस्वियोंका श्रेष्ठ तप है। जैसे देवताओंमें श्रीकृष्ण, देवियोंमें प्रकृति, वर्णोंमें ब्राह्मण तथा वैष्णवोंमें भगवान् शिव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार व्रतोंमें यह एकादशीव्रत श्रेष्ठ है। यह चारों वर्णोंके लिये सदा ही पालनीय व्रत है। यतियों, वैष्णवों तथा विशेषतः ब्राह्मणोंको तो इस व्रतका पालन अवश्य करना चाहिये। सचमुच ही ब्रह्महत्या आदि सारे पाप एकादशीके दिन चावल (भात)-का आश्रय लेकर रहते हैं। जो मन्द-बुद्धि मानव इतने पापोंका भक्षण करते हुए चावल खाता है, वह इस लोकमें अत्यन्त पातकी है और अन्तमें निश्चय ही नरकगामी होता है। दशमीके लङ्घनमें जो दोष है, उसे बताता हूँ; सुनो। पूर्वकालमें धर्मके मुखसे मैंने इसका श्रवण किया था। जो मूढ़ जान-बूझकर कलामात्र दशमीका लङ्घन करता है, उसे तुरंत ही दारुण शाप देकर लक्ष्मी उसके घरसे निकल जाती हैं। इस लोकमें निश्चय ही उसके वंशकी और यशकी भी हानि होती है। जिस दिन दशमी, एकादशी और द्वादशी तीनों तिथियाँ हों, उस दिन भोजन करके दूसरे दिन उपवास-व्रत करना चाहिये। द्वादशीको व्रत करके त्रयोदशीको पारण करना चाहिये। उस दशामें व्रतधारियोंको द्वादशी-लङ्घनसे दोष नहीं होता। जब पूरे दिन और रातमें एकादशी हो तथा उसका कुछ भाग दूसरे दिन प्रातःकालतक चला गया हो, तब दूसरे दिन ही उपवास करना चाहिये। यदि परा तिथि बढ़कर साठ दण्डकी हो गयी हो और प्रातःकाल तीन तिथियोंका स्पर्श हो तो गृहस्थ पूर्व दिनमें ही व्रत करते हैं; यति आदि नहीं। उन्हें दूसरे दिन उपवास करके नित्य-कृत्य करना चाहिये। दो दिन एकादशी हो तो भी व्रतमें सारा जागरण-सम्बन्धी कार्य पहली ही रातमें करे। पहले दिनमें व्रत करके दूसरे दिन एकादशी बीतनेपर पारण करे। वैष्णवों, यतियों, विधवाओं, भिक्षुओं एवं ब्रह्मचारियोंको सभी एकादशियोंमें उपवास करना चाहिये। वैष्णवेतर गृहस्थ शुक्लपक्षकी एकादशीको ही उपवास-व्रत करते हैं। अतः नारद! उनके लिये कृष्णा एकादशीका लङ्घन करनेपर भी वेदोंमें दोष नहीं बताया गया है। हरिशयनी और हरिबोधिनी-इन दो एकादशियोंके बीचमें जो कृष्णा एकादशियाँ आती हैं, उन्हींमें गृहस्थ पुरुषको उपवास करना चाहिये। इनके सिवा दूसरी किसी कृष्णपक्षकी एकादशीमें गृहस्थ पुरुषको उपवास नहीं करना चाहिये। ब्रह्मन् ! इस प्रकार एकादशीके विषयमें निर्णय कहा गया, जो श्रुतिमें प्रसिद्ध है। अब इस व्रतका विधान बताता हूँ, सुनो। दशमीके दिन पूर्वाह्नमें एक बार हविष्यान्न भोजन करे। उसके बाद उस दिन फिर जल भी न ले। रातमें कुशकी चटाईपर अकेला शयन करे और एकादशीके दिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर प्रातःकालिक कार्य करके नित्य-कृत्य पूर्ण करनेके पश्चात् स्नान करे। फिर श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे व्रतोपवासका संकल्प लेकर संध्या-तर्पण करनेके अनन्तर नैत्यिक पूजन आदि करे। दिनमें नैत्यिक पूजन करके व्रतसम्बन्धी आवश्यक सामग्रीका संग्रह करे। षोडशोपचार- सामग्रीका सानन्द संग्रह करके शास्त्रीय विधिसे प्रेरित हो आवश्यक कार्य करे। षोडश उपचारोंके