ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हे श्रीकृष्ण! हे राधाकान्त! हे करुणासागर! हे प्रभो! घोर एवं भयानक संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये। प्रभो! सैकड़ों जन्मोंसे सांसारिक क्लेश भोगनेके कारण मैं उद्विग्न हो उठा हूँ और अपने कर्मपाशरूपी बेड़ियोंसे बँधा हूँ। आप इस बन्धनसे मुझे छुड़ाइये। नाथ! आपके चरणोंमें पड़ा हूँ। मुझ शरणागतकी ओर कृपापूर्वक देखिये। भवपाशके भयसे डरे हुए मुझ शरणापन्नकी रक्षा कीजिये। प्रभो! जो वस्तु भक्तिहीन, क्रियाहीन, विधिहीन तथा वेदमन्त्रोंसे रहित हो और इस प्रकार जिसके समर्पणमें त्रुटि आ गयी हो; उसे आप स्वयं ही पूर्ण कीजिये। हरे! वेदोक्त विधिको न जाननेके कारण अङ्गहीन हुए कर्ममें आपके नामोच्चारणसे ही समस्त न्यूनताओंकी पूर्ति होती है।
इस प्रकार स्तुति और प्रणाम करके ब्राह्मणको दक्षिणा दे और महोत्सवपूर्वक व्रती पुरुष रातमें जागरण करे। यदि व्रत और उपवास करके कोई नींद ले ले अथवा पुनः जल पी ले तो उसे उस व्रतका आधा ही फल मिलता है; अतः विप्रवर! यत्नपूर्वक एक ही बार हविष्यान्न ग्रहण करे। उस समय श्रीकृष्णके चरणोंका स्मरण करते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रको पढ़े।
विष्णुरूप अन्न! ब्रह्माद्वारा प्राणियोंके प्राणके रूपमें तुम्हारा निर्माण हुआ है; अतः तुम मुझे व्रत और उपवासका फल दो। जो इस प्रकार भारतवर्षमें भक्तिपूर्वक इस उत्तम व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पहले और बादकी सात-सात पीढ़ियोंका तथा अपना भी अवश्य ही उद्धार करता है। व्रती मनुष्य निश्चय ही माता, पिता, भाई, सास, ससुर, पुत्री, दामाद तथा भृत्य-वर्गका भी उद्धार कर देता है। ब्रह्मन्! इस तरह श्रीकृष्णका चरित्र और व्रत कहा गया। यह सुख और मोक्ष प्रदान करनेवाला सारभूत साधन है। अब मैं तुमसे श्रीकृष्णकी दूसरी लीलाएँ कहता हूँ। (अध्याय २६)
गोपकिशोरियोंद्वारा गौरी-व्रतका पालन, दुर्गा-स्तोत्र और उसकी महिमा, समासिके दिन गोपियोंको नग्न-स्नान करती जान श्रीकृष्णद्वारा उनके वस्त्र आदिका अपहरण, श्रीराधाकी प्रार्थनासे भगवान्का सब वस्तुएँ लौटा देना, व्रतका विधान, दुर्गाका ध्यान, गौरी-व्रतकी कथा, लक्ष्मीस्वरूपा वेदवतीका सीता होकर इस व्रतके प्रभावसे श्रीरामको पतिरूपमें पाना, सीताद्वारा की हुई पार्वतीकी स्तुति, श्रीराधा आदिके द्वारा व्रतान्तमें दान, देवीका उन सबको दर्शन देकर राधाको स्वरूपकी स्मृति कराना, उन्हें अभीष्ट वर देना तथा श्रीकृष्णका राधा आदिको पुनः दर्शन-सम्बन्धी मनोवाञ्छित वर देना
भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद! सुनो। अब मैं पुनः श्रीकृष्ण-लीलाका वर्णन करता हूँ। यह वह लीला है, जिसमें गोपियोंके चीरका अपहरण हुआ और उन्हें मनोवाञ्छित वरदान दिया गया। हेमन्तके प्रथम मास—मार्गशीर्षमें गोपाङ्गनाएँ प्रेमके वशीभूत हो प्रतिदिन केवल एक बार हविष्यान्न ग्रहण करके पूर्णतः संयमशील हो पूरे महीनेभर भक्तिभावसे व्रत करती रहीं। वे नहाकर यमुनाके तटपर पार्वतीकी बालुकामयी मूर्ति बना उसमें देवीका आवाहन करके