भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 567

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५५७

इसलिये भी उन्हें 'शिवा' कहा गया है। 'शिव' शब्द मोक्षका बोधक है तथा 'आकार' दाताका। वे देवी स्वयं ही मोक्ष देनेवाली हैं; इसलिये 'शिवा' कही गयी हैं। 'अभय' का अर्थ है भयनाश और 'आकार' का अर्थ है दाता। वे तत्काल अभय-दान करती हैं; इसलिये 'अभया' कहलाती हैं। 'मा' का अर्थ है राजलक्ष्मी और 'या' का अर्थ है प्राप्ति करानेवाला। जो शीघ्र ही राजलक्ष्मीकी प्राप्ति कराती हैं; उन्हें 'माया' कहा गया है। 'मा' मोक्ष अर्थका और 'या' प्राप्ति अर्थका वाचक है। जो सदा मोक्षकी प्राप्ति कराती हैं, उनका नाम 'माया' है। वे देवी भगवान् नारायणका आधा अङ्ग हैं। उन्हींके समान तेजस्विनी हैं और उनके शरीरके भीतर निवास करती हैं; इसलिये उन्हें 'नारायणी' कहते हैं। 'सनातन' शब्द नित्य और निर्गुणका वाचक है। जो देवी सदा निर्गुणा और नित्या हैं; उन्हें 'सनातनी' कहा गया है। 'जय' शब्द कल्याणका वाचक है और 'आकार' दाताका। जो देवी सदा जयदेती हैं, उनका नाम 'जया' है। 'सर्वमङ्गल' शब्द सम्पूर्ण ऐश्वर्यका बोधक है और 'आकार' का अर्थ है देनेवाला। ये देवी सम्पूर्ण ऐश्वर्यको देनेवाली हैं; इसलिये 'सर्वमङ्गला' कही गयी हैं। ये देवीके आठ नाम सारभूत हैं और यह स्तोत्र उन नामोंके अर्थसे युक्त है।

भगवान् नारायणने नाभिकमलपर बैठे हुए ब्रह्माको इसका उपदेश दिया था। उपदेश देकर वे जगदीश्वर योगनिद्राका आश्रय ले सो गये। तदनन्तर जब मधु और कैटभ नामक दैत्य ब्रह्माजीको मारनेके लिये उद्यत हुए तब ब्रह्माजीने इस स्तोत्रके द्वारा दुर्गाजीका स्तवन एवं नमन किया। उनके द्वारा स्तुति की जानेपर साक्षात् दुर्गाने उन्हें 'सर्वरक्षण' नामक दिव्य श्रीकृष्ण-कवचका उपदेश दिया। कवच देकर महामाया अदृश्य हो गयीं। उस स्तोत्रके ही प्रभावसे विधाताको दिव्य कवचकी प्राप्ति हुई। उस श्रेष्ठ कवचको पाकर निश्चय ही वे निर्भय हो गये। फिर ब्रह्माने महेश्वरको उस समय स्तोत्र और कवचका उपदेश दिया, जब कि त्रिपुरासुरके साथ युद्ध करते समय रथसहित भगवान् शंकर नीचे गिर गये थे। उस कवचके द्वारा आत्मरक्षा करके उन्होंने निद्राकी स्तुति की। फिर योगनिद्राके अनुग्रह और स्तोत्रके प्रभावसे वहाँ शीघ्र ही वृषभरूपधारी भगवान् जनार्दन आये। उनके साथ शक्तिस्वरूपा दुर्गा भी थीं। वे भगवान् शंकरको विजय देनेके लिये आये थे। उन्होंने रथसहित शंकरको मस्तकपर बिठाकर अभय दान दिया और उन्हें आकाशमें बहुत ऊँचाईतक पहुँचा दिया। फिर जयाने शिवको विजय दी। उस समय ब्रह्मास्त्र हाथमें ले योगनिद्रासहित श्रीहरिका स्मरण करते हुए भगवान् शंकरने स्तोत्र और कवच पाकर त्रिपुरासुरका वध किया था।

इसी स्तोत्रसे दुर्गाका स्तवन करके गोपकुमारियोंने श्रीहरिको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त कर लिया। इस स्तोत्रका ऐसा ही प्रभाव है। गोपकन्याओंद्वारा किया गया 'सर्वमङ्गल' नामक स्तोत्र शीघ्र ही समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाला और मनोवाञ्छित वस्तुको देनेवाला है। शैव, वैष्णव अथवा शाक्त कोई भी क्यों न हो, जो मानव तीनों संध्याओंके समय प्रतिदिन भक्तिभावसे इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह संकटसे मुक्त हो जाता है। स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मनुष्य तत्काल ही संकटमुक्त एवं निर्भय हो जाता है। साथ ही सम्पूर्ण उत्तम ऐश्वर्य एवं मनोवाञ्छित वस्तुको शीघ्र प्राप्त कर लेता है। पार्वतीकी कृपासे इहलोकमें श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और निरन्तर स्मृति पाता है एवं अन्तमें भगवान्के दास्यसुखको उपलब्ध करता है।

इस स्तवराजके द्वारा व्रजाङ्गनाओंने एक मासतक प्रतिदिन बड़ी भक्तिके साथ ईश्वरीका स्तवन एवं नमन किया। जब मास पूरा हुआ