भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 570

५६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण माना। जिस स्थानपर और जिस आधारमें जो द्रव्य पहले रखा गया था, वस्त्रोंसहित वह सब द्रव्य गोपकन्याओंको उसी रूपमें प्राप्त हुआ। फिर तो वे सब-की-सब देवियाँ जलसे निकलकर व्रत पूर्ण करके मनोवाञ्छित वर पाकर अपने- अपने घरको चली गयीं। नारदजीने पूछा—प्रभो! उस व्रतका क्या विधान है? क्या नाम है और क्या फल है? उसमें कौन-कौन-सी वस्तुएँ और कितनी दक्षिणा देनी चाहिये। व्रतके अन्तमें कौन-सा मनोहर रहस्य प्रकट हुआ? महाभाग! इस नारायण- कथाको विस्तारपूर्वक कहिये। भगवान् नारायण बोले—वत्स ! उस व्रतका सारा विधान मुझसे सुनो। उसका नाम गौरी-व्रत है। मार्गशीर्ष मासमें सबसे पहले स्त्रियोंने इसे किया था। यह पुरुषोंको भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाला तथा श्रीकृष्णकी भक्ति प्रदान करनेवाला है। भिन्न-भिन्न देशोंमें इसकी प्रसिद्धि है। यह व्रत पूर्वपरम्परासे पालित होनेवाला माना गया है। पतिकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाला है। इससे प्रियतम पति-निमित्तक फलकी प्राप्ति होती है। कुमारी कन्याको चाहिये कि वह पहले दिन उपवास करके अपने वस्त्रको धो डाले और संयमपूर्वक रहे। फिर मार्गशीर्ष मासकी संक्रान्तिके दिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक नदीके तटपर जाकर स्नान करके वह दो धुले हुए वस्त्र (साड़ी और चोली) धारण करे। तत्पश्चात् कलशमें गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और दुर्गा (पार्वती) — इन छः देवताओंका आवाहन करके नाना द्रव्योंद्वारा उनका पूजन करे। इन सबका पञ्चोपचार पूजन करके वह व्रत आरम्भ करे। कलशके सामने नीचे भूमिपर एक सुविस्तृत वेदी बनावे। वह वेदी चौकोर होनी चाहिये। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे उस वेदीका संस्कार करे (इन द्रव्योंसे चौक पूरकर उसे सजा दे)। इसके बाद बालूकी दशभुजा दुर्गामूर्ति बनावे। देवीके ललाटमें सिन्दूर लगावे और नीचेके अङ्गोंमें चन्दन एवं कपूर अर्पित करे। तदनन्तर ध्यानपूर्वक देवीका आवाहन करे। उस समय हाथ जोड़कर निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करे। उसके बाद पूजा आरम्भ करनी चाहिये। हे गौरि शङ्करार्धाङ्गि यथा त्वं शङ्करप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्॥ 'भगवान् शंकरकी अर्धाङ्गिनी कल्याणमयी गौरीदेवि ! जैसे तुम शंकरजीको बहुत ही प्रिय हो, उसी प्रकार मुझे भी अपने प्रियतम पतिकी परम दुर्लभा प्राणवल्लभा बना दो।' इस मन्त्रको पढ़कर देवी जगदम्बाका ध्यान करे। उनका गूढ़ ध्यान सामवेदमें वर्णित है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। नारद! वह ध्यान मुनीन्द्रोंके लिये भी दुर्लभ है, तथापि मैं तुम्हें बता रहा हूँ। इसके अनुसार सिद्ध पुरुष दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका ध्यान करते हैं। दुर्गाका ध्यान भगवती दुर्गा शिवा (कल्याणस्वरूपा), शिवप्रिया, शैवी (शिवसे प्रगाढ़ सम्बन्ध रखनेवाली) तथा शिवके वक्षःस्थलपर विराजमान होनेवाली हैं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द मुसकानकी प्रभा फैली रहती है। उनकी बड़ी प्रतिष्ठा है। उनके नेत्र मनोहर हैं। वे नित्य नूतन यौवनसे सम्पन्न हैं और रत्नमय आभूषण धारण करती हैं। उनकी भुजाएँ रत्नमय केयूर तथा कङ्कणोंसे और दोनों चरण रत्ननिर्मित नूपुरोंसे विभूषित हैं। रत्नोंके बने हुए दो कुण्डल उनके दोनों कपोलोंकी शोभा बढ़ाते हैं। उनकी वेणीमें मालतीकी माला लगी हुई है, जिसपर भ्रमर मँडराते रहते हैं। भालदेशमें कस्तूरीकी बेंदीके साथ सिन्दूरका सुन्दर तिलक शोभा पाता है। उनके दिव्य वस्त्र अग्निकी ज्वालासे शुद्ध किये गये हैं। वे मस्तकपर रत्नमय