भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 618

६०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हैं। दुःख, शोक और उद्वेगसे सदा भयकी प्राप्ति होती है। महेश्वर! यदि इनके बीज नष्ट हो जायें तो ये सब स्वतः नष्ट हो जाते हैं। चञ्चल मन ही पुण्य और पापका बीज है। शम्भो! सम्पूर्ण इन्द्रियोंसहित मन मेरा अंश है। सबका जनक जो अहंकार है, उसके अधिष्ठाता चेतन तुम हो और ये ब्रह्मा बुद्धिके अधिष्ठाता हैं। परब्रह्म परमात्मा एक हैं। गुण-भेदसे ही सदा उसके भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। वह ब्रह्मतत्त्व एक होनेपर भी अनेक प्रकारका है। शिव! वह सगुण भी है और निर्गुण भी। जो मायारूप उपाधिका आश्रय लेता है, वह सगुण और जो मायातीत है, वह निर्गुण कहलाता है। भगवान् स्वेच्छामय हैं। वे अपनी इच्छासे ही विविध रूपोंमें प्रकट होते हैं। उनकी इच्छाशक्तिका ही नाम प्रकृति है। वह नित्यस्वरूपा और सदा सबकी जननी है। कुछ लोग ज्योतिःस्वरूप सनातन ब्रह्मको एक ही बताते हैं तथा कुछ दूसरे विद्वान् उसे प्रकृतिसे युक्त होनेके कारण द्विविध कहते हैं। जो एक बताते हैं, उनका मत सुनो। ब्रह्म माया तथा जीवात्मा दोनोंसे परे है। उस ब्रह्मसे ही वे दोनों (माया और जीवात्मा) प्रकट होते हैं; अतः ब्रह्म ही सबका कारण है। वह परब्रह्म एक होकर भी स्वेच्छासे दो हो जाता है। उसकी इच्छाशक्ति ही प्रकृति है, जो सदा सम्पूर्ण शक्तियोंकी जननी होती है। उससे संयुक्त होनेके कारण वे परमात्मा 'सगुण' कहे जाते हैं। वे ही सबके आधार, सनातन, सर्वेश्वर, सर्वसाक्षी तथा सर्वत्र फलदाता होते हैं। शम्भो! शरीर भी दो प्रकारका होता है—एक नित्य और दूसरा प्राकृत। नित्य शरीरका विनाश नहीं होता; परंतु प्राकृत शरीर सदा नश्वर होता है। भगवन्! हम दोनोंके शरीर नित्य हैं। हमारे अंशभूत जो अन्य जीव हैं, उनके शरीर त्रिगुणात्मिका प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण प्राकृत कहलाते हैं। प्राकृत शरीर सदा ही विनाशशील हैं। रुद्र आदि तुम्हारे अंश हैं और विष्णुरूपधारी मेरे अंश। मेरे भी दो रूप हैं—द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज मैं हूँ और वैकुण्ठधाममें लक्ष्मी तथा पार्षदोंके साथ रहता हूँ। द्विभुजरूपसे मैं श्रीकृष्ण कहलाता हूँ और गोलोकमें गोपियों तथा राधाके साथ निवास करता हूँ।

जो ब्रह्मको द्विविध बताते हैं, उनके मतमें दो प्रधान तत्त्व हैं—नित्य पुरुष तथा नित्या प्रकृति ईश्वरी। शिव! वे दोनों सदा परस्पर संयुक्त रहते हैं। वे ही सबके माता-पिता हैं। वे दोनों अपनी इच्छाके अनुसार कभी साकार और कभी निराकार होते हैं। दोनों ही सर्वस्वरूप हैं। जैसे पुरुषकी नित्य प्रधानता है, उसी तरह प्रकृतिकी भी है। शम्भो! यदि तुम सतीको पाना चाहते हो तो प्रकृतिका स्तवन करो। तुमने पूर्वकालमें दुर्वासाको प्रसन्नतापूर्वक जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, वह दिव्य है और उसका कण्वशाखामें वर्णन किया गया है। तुम उसीके द्वारा जगदम्बाकी आराधना करो। शिव! मेरे आशीर्वादसे तुम्हारे शोकका नाश हो। तुम्हें कल्याणकी प्राप्ति हो और तुम्हारे लिये विप्लवका कारण बना हुआ पत्नीके वियोगका यह रोग दूर हो जाय।

गिरिराज! ऐसा कहकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु चुप हो गये। तदनन्तर महेश्वरने प्रकृतिके स्तवनका कार्य आरम्भ किया। उन्होंने स्नान करके श्रीकृष्ण और ब्रह्माको भक्तिपूर्वक हाथ जोड़ नमस्कार किया। उस समय उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा था।

महेश्वर बोले—'ॐ नमः प्रकृत्यै'

ॐ (सच्चिदानन्दमयी) प्रकृतिदेवीको नमस्कार है।

ब्राह्मि! तुम ब्रह्मस्वरूपिणी हो। सनातनि!