भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 621

• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६११ पार्वतीके विवाहकी तैयारी, हिमवान्‌के द्वारपर दूल्हा शिवके साथ बारातमें विष्णु आदि देवताओंका आगमन, हिमालयद्वारा उनका सत्कार, वरको देखनेके लिये स्त्रियोंका आगमन, वरके अलौकिक रूप-सौन्दर्यको देख मेनाका प्रसन्न होना, स्त्रियोंद्वारा दुर्गाके सौभाग्यकी सराहना, दुर्गाका रूप, दम्पतिका एक-दूसरेकी ओर देखना, गिरिराजद्वारा दहेजके साथ शिवके हाथमें कन्याका दान तथा शिवका स्तवन भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- वसिष्ठजीके पूर्वोक्त वचनको सुनकर सेवकगणों तथा पत्नीसहित हिमालयको बड़ा विस्मय हुआ; किंतु स्वयं पार्वती मन-ही-मन हँस रही थी। अरुन्धतीने भी उन मेनादेवीको, जो शोकसे कातर हो खाना-पीना छोड़कर रो रही थीं; समझाया। तब उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक शोकका त्याग कर दिया तथा अरुन्धतीको उत्तम भोजन कराकर स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद वे प्रसन्न- चित्तसे समस्त मङ्गलकार्योंका सम्पादन करने लगीं। प्रिये! तदनन्तर वसिष्ठजीकी आज्ञासे हिमालयने वैवाहिक सामग्री एकत्रित की और बड़ी उतावलीके साथ विभिन्न स्थानोंमें निमन्त्रणपत्र भेजवाया। तत्पश्चात् उन्होंने शिवके पास मङ्गलपत्रिका पठवायी। इसके बाद शैलराजने विवाहके लिये भोज्यपदार्थ, मिष्टान्न, दिव्य वस्त्र तथा स्वर्ण-रत्न आदिका अपार संग्रह किया। पार्वतीको स्नान करवाकर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत किया गया। उसके नेत्रोंमें काजल और पैरोंमें महावर लगाया गया। इधर देवेश्वरगण विविध वाहनोंपर सवार हो रत्नमय रथपर आरूढ़ हुए भगवान् शंकरको साथ लिये हिमालय-भवनके समीप पहुँचे। वहाँ भाँति- भाँतिसे सबका स्वागत-सत्कार किया गया। देवेश्वरोंको सामने देख हिमालयने उन्हें प्रणाम किया और सेवकोंको आज्ञा दी कि 'इन सम्माननीय अतिथियोंके लिये सिंहासन प्रस्तुत किये जायँ।' तत्पश्चात् विनतानन्दन गरुड़की पीठसे तत्काल ही उतरकर चार-भुजाधारी भगवान् नारायण अपने पार्षदोंसहित सिंहासनपर बैठे। रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित चतुर्भुज पार्षद रत्नमयी मुट्ठीमें बँधे हुए श्वेत चामरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे। उस समाजमें श्रेष्ठतम ऋषि और बड़े-बड़े देवता उनके गुण गा रहे थे। भगवान्‌का प्रसन्नमुख मन्द मुस्कानसे सुशोभित था और वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। उनके पास ही देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी बैठे। ऋषि और मुनि भी मङ्गलमय स्थानपर विराजमान हुए। इसी समय भगवान् शिव रथसे उतरकर रत्नमय सिंहासनपर बैठे। बैठकर उन्होंने पर्वतराज हिमालयकी ओर देखा। तत्पश्चात् भगवान् शिवको देखनेके लिये वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो शैलेन्द्र-नगरकी स्त्रियाँ आयीं। उनमें बालिकाएँ, युवतियाँ और वृद्धाएँ भी थीं। ऋषियों, देवों, नागों, गन्धर्वों, पर्वतों और राजाओंकी भी मनोहर कन्याएँ वहाँ आ पहुँचीं। मेनाने कुमारी कन्याओंके साथ दूल्हा शंकरका दर्शन किया। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति मनोहर चम्पाके समान गौर थी। वे एक मुख तथा तीन नेत्रोंसे सुशोभित थे। उनके प्रसन्न- मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके अङ्ग