भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 625

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१५

सज्जित हो अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर कैलासकी यात्राके लिये उद्यत हो गये। उस समय नारायणकी आज्ञासे धर्म उस वासभवनमें गये और योगिश्वर शंकरसे समयोचित वचन बोले।

धर्मने कहा—प्रमथेश्वर! आपका कल्याण हो। उठिये, उठिये और श्रीहरिका स्मरण करते हुए माहेन्द्र-योगमें पार्वतीके साथ यात्रा कीजिये।

वृन्दावनविनोदिनि! धर्मकी बात सुनकर शंकरने पार्वतीके साथ माहेन्द्र-योगमें यात्रा आरम्भ की। पार्वतीके साथ देवेश्वर शंकरके यात्रा करते समय मेना उच्चस्वरसे रो पड़ीं और उन कृपानिधानसे बोलीं।

मेनाने कहा—कृपानिधे! कृपा करके मेरी बच्चीका पालन कीजियेगा। आप आशुतोष हैं। इसके सहस्रों दोषोंको क्षमा कीजियेगा। मेरी बेटी जन्म-जन्ममें आपके चरणकमलोंमें अनन्यभक्ति रखती आयी है। सोते-जागते हर समय इसे अपने स्वामी महादेवके सिवा दूसरे किसीकी याद नहीं आती है। आपके प्रति भक्तिकी बातें सुनते ही इसका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठता है और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहने लगते हैं। मृत्युञ्जय! आपकी निन्दा कानमें पड़नेपर यह ऐसी मौन हो जाती है, मानो मर गयी हो।

मेना यह कह ही रही थीं कि हिमवान् तत्काल वहाँ आ पहुँचे और अपनी बच्चीको छातीसे लगा फूट-फूटकर रोने लगे—'वत्से! हिमालयको—मेरे इस घरको सूना करके तू कहाँ चली जा रही है? तेरे गुणोंको याद करके मेरा हृदय अवश्य ही विदीर्ण हो जायगा।' यों कहकर शैलराजने अपनी शिवा शिवको सौंप दी और पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंसहित वे बारंबार उच्चस्वरसे रोदन करने लगे। उस समय कृपानिधान साक्षात् भगवान् नारायणने उन सबको कृपापूर्वक अध्यात्मज्ञान देकर धीरज बँधाया। पार्वतीने भक्तिभावसे माता-पिता और गुरुको प्रणाम किया। वे महामायारूपिणी हैं; अतः मायाका आश्रय ले बारंबार जोर-जोरसे रोने लगीं। पार्वतीके रोनेसे ही वहाँ सब स्त्रियाँ रोने लगीं। पत्नियों तथा सेवकगणोंसहित सम्पूर्ण देवता और मुनि भी रो पड़े। फिर वे मानसशायी देवता शीघ्र ही कैलासपर्वतको चल दिये तथा दो ही घड़ीमें शिवके निवासस्थानपर सानन्द जा पहुँचे। यह देखकर वहाँके मङ्गल-कृत्यका सम्पादन करनेके लिये देवताओं और मुनियोंकी पत्नियाँ भी दीप लिये शीघ्रतापूर्वक सहर्ष वहाँ आ गयीं। वायु, कुबेर और शुक्रकी स्त्रियाँ, बृहस्पतिकी पत्नी तारा, दुर्वासाकी स्त्री, अत्रि-भार्या अनसूया, चन्द्रमाकी पत्नियाँ, देवकन्या, नागकन्या तथा सहस्रों मुनिकन्याएँ वहाँ उपस्थित हुईं। वहाँ जिन असंख्य कामिनियोंका समूह आया था, उन सबकी गणना करनेमें कौन समर्थ है? उन सबने मिलकर नवदम्पतिका उनके निवास-मन्दिरमें प्रवेश कराया तथा उन महेश्वरको रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया। वहाँ भगवान् शिवने सतीको उनका पहलेवाला घर दिखाया और प्रसन्नतापूर्वक पूछा—'प्रिये! क्या तुम्हें अपने इस घरकी याद आती है? यहींसे तुम अपने पिताके निवास-स्थानको गयी थीं। अन्तर इतना ही है कि इस समय तुम गिरिराजकुमारी हो और उस समय यहाँ दक्षकन्याके रूपमें निवास करती थीं। तुम्हें पूर्वजन्मकी बातोंका सदा स्मरण रहता है; इसीलिये पिछली बातोंकी याद दिला रहा हूँ। यदि तुम्हें उन बातोंका स्मरण है तो कहो।'

भगवान् शंकरकी बात सुनकर पार्वती मुस्करायीं और बोलीं—'प्राणनाथ! मुझे सब बातोंका स्मरण है; किंतु इस समय आप चुप रहें (उन बीती बातोंकी चर्चा न करें)।' तत्पश्चात् शिवने सामग्री एकत्र करके नारायण आदि देवताओंको नाना प्रकारके मनोहर पदार्थ भोजन कराये। भोजनके पश्चात् भाँति-भाँतिके रत्नोंसे अलंकृत हो अपनी स्त्रियों और सेवकगणोंसहित