ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
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थे। उन असंख्य नागोंको देखकर धन्वन्तरिके शिष्योंको बड़ा भय हुआ। वे सब शिष्य नागोंके निःश्वास-वायुसे मृतक-तुल्य हो गये और निश्चेष्ट तथा ज्ञानशून्य हो पृथ्वीपर पड़ गये। भगवान् धन्वन्तरिने गुरुका स्मरण करते हुए मन्त्रका पाठ और अमृतकी वर्षा करके सब शिष्योंको जीवित कर दिया। उनमें चेतना उत्पन्न करके जगद्गुरु धन्वन्तरिने मन्त्रोंद्वारा भयानक विषवाले सर्पसमूहको जृम्भित कर दिया। फिर तो वे सब-के-सब ऐसे निश्चेष्ट हुए, मानो मर गये हों। उन नागगणोंमें कोई ऐसा भी नहीं रह गया, जो नागराजको समाचार दे सके; परंतु नागराज वासुकि सर्वज्ञ हैं, उन्होंने सर्पोंके उन समस्त संकटको जान लिया और अपनी ज्ञानरूपिणी बहिन जगद्गौरी मनसा (या जरत्कारु)-को बुलाया।
वासुकिने उससे कहा—मनसे! तुम जाओ और अत्यन्त संकटसे नागोंकी रक्षा करो। महाभागे! ऐसा करनेपर तुम्हारी तीनों लोकोंमें पूजा होगी।
वासुकिकी बात सुनकर वह नागकन्या हँस पड़ी और विनीत भावसे खड़ी हो अमृतके समान मधुर वचन बोली।
मनसाने कहा—नागराज ! मेरी बात सुनिये। मैं युद्धके लिये जाऊँगी। शुभ और अशुभ (जीत और हार) तो दैवके हाथमें है; परंतु मैं यथोचित कर्तव्यका पालन करूँगी। समराङ्गणमें लीलापूर्वक उस शत्रुका संहार कर डालूँगी। जिसे मैं मार दूँगी, उसकी रक्षा कौन कर सकता है? मेरे बड़े भाई और गुरु भगवान् शेषने मुझे जगदीश्वर नारायणका परम अद्भुत सिद्ध मन्त्र प्रदान किया है। मैं अपने कण्ठमें 'त्रैलोक्य-मङ्गल' नामक उत्तम कवच धारण करती हूँ; अतः संसारको भस्म करके पुनः उसकी सृष्टि करनेमें समर्थ हूँ। मन्त्रशास्त्रोंमें मैं भगवान् शंकरकी शिष्या हूँ। पूर्वकालमें भगवान् शिवने कृपापूर्वक मुझे महान् ज्ञान दिया था।
ऐसा कहकर श्रीहरि, शिव तथा शेषनागको प्रणाम करके मनमें हर्ष और उत्साह लिये मनसा अन्य नागोंको वहीं छोड़ अकेली ही रोषपूर्वक उस स्थानको गयी। उस समय मनसादेवीकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। वह उस स्थानपर आयी, जहाँ प्रसन्नमुख और नेत्रवाले धन्वन्तरिदेव विराजमान थे। सुन्दरी मनसाने दृष्टिमात्रसे ही सम्पूर्ण सर्पोंको जीवित कर दिया और अपनी विषपूर्ण दृष्टि डालकर शत्रुके शिष्योंको चेष्टाशून्य बना दिया। भगवान् धन्वन्तरि मन्त्र-शास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे। उन्होंने मन्त्रद्वारा शिष्योंको उठानेका यत्न किया, परंतु वे सफल न हो सके। तब मनसादेवीने धन्वन्तरिकी ओर देख हँसकर अहंकारभरी बात कही।
मनसा बोली—सिद्धपुरुष! बताओ तो सही, क्या तुम मन्त्रका अर्थ, मन्त्रशिल्प, मन्त्रभेद और महान् औषधका ज्ञान रखते हो? गरुड़के शिष्य हो न? मैं और गरुड़ दोनों भगवान् शंकरके विख्यात शिष्य हैं और दीर्घकालतक गुरुके पास शिक्षा लेते रहे हैं।
यों कहकर जगदम्बा मनसा सरोवरसे कमल ले आयी और उसे मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके क्रोधपूर्वक धन्वन्तरिकी ओर चलाया। प्रज्वलित अग्निशिखाके समान जलते हुए उस कमल-पुष्पको आते देख धन्वन्तरिने निःश्वासमात्रसे उसको भस्म कर दिया। तत्पश्चात् मन्त्रसे अभिमन्त्रित एक मुट्ठी धूल लेकर उसके द्वारा उन्होंने उस भस्मको भी निष्फल कर दिया। फिर वे अवहेलनापूर्वक हँसने लगे। तब मनसादेवीने ग्रीष्मकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाली शक्ति हाथमें ले ली और उसे मन्त्रसे आवेष्टित करके शत्रुके ओर चला दिया। उस जाज्वल्यमान शक्तिको आते देख धन्वन्तरिने भगवान् विष्णुके दिये हुए शूलसे अनायास ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। शक्तिको भी व्यर्थ हुई देख देवी मनसा