ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण आँखें इधर-उधर घूमती थीं। वे सम्पूर्ण वनमें भ्रमण करतीं और 'हा नाथ ! हा नाथ !' पुकारती हुई बिना खाये-पीये रह रही थीं। उनके मनमें बड़ा रोष था। प्रेमविच्छेदसे कातर राधिकाने उन सबको देखकर उनसे मलयवनमें भ्रमण आदिका अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर वे उन सबके साथ रोदन करने लगीं। विरहसे आतुर हो 'हा नाथ ! हा नाथ !' का उच्चारण करके बारंबार विलाप करती हुई सब गोपियाँ कुपित हो अपने शरीरका त्याग कर देनेको उद्यत हो गयीं। इसी समय वहाँ चन्दनवनमें पधारकर श्रीकृष्णने राधा तथा गोपियोंको दर्शन दिये। प्राणेश्वरको आया देख गोपाङ्गनाओंसहित राधा आनन्दसे मुस्करायीं और पुलकित-शरीर हो उनकी ओर दौड़ीं। पास जाकर वे सब गोपाङ्गनाएँ प्रेमसे विह्नल हो रोने लगीं। फिर उन सबने श्रीकृष्णसे विरहजनित अपने सारे दुःखको निवेदन किया। दिन-रात स्नान और खाना-पीना छोड़कर वन-वनमें निरन्तर भटकते रहना तथा अन्तमें शरीरको त्याग देनेका विचार करना आदि सब बातें बताकर उन सबने क्षणभर उन्हें बहुत फटकारा। फिर वे एक क्षणतक प्रसन्नतासे उनके गुण गाती रहीं। इसके बाद कुछ देर उन्हें आभूषण पहनाती तथा चन्दन लगाती रहीं। कोई-कोई गोपियाँ बोलीं- 'अरी सखि ! देखो, श्यामसुन्दर हमारे प्राणोंके चोर हैं। इनकी निरन्तर रखवाली करो। ये कहीं जाने न पावें।' यह सुनकर दूसरी बोल उठी- 'नहीं सखी ! अब ये फिर ऐसा अपराध कभी नहीं करेंगे।' कोई कहने लगी- 'अरी सखियो ! इन्हें शीघ्र ही चारों ओरसे घेरकर बीचमें कर लो।' दूसरी बोली- 'नहीं, नहीं सखी ! इन्हें प्रेमपाशसे बाँधकर हृदय-मन्दिरमें कैद कर लो।' कोई बोली- 'ये पुरुष हैं; इनपर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता।' अन्य बोल उठी- 'इन चित्तचोरकी यत्नपूर्वक देखभाल करो।' कोई-कोई कुपित होकर कहने लगीं- 'ये निष्ठुर हैं, नरघाती हैं।' कोई बोली- 'अब फिर इनसे बात न करो।' तदनन्तर जो-जो रमणीय और निर्जन वन थे, उन सबमें गोपियाँ श्रीकृष्णके साथ कौतूहलपूर्वक घूमती रहीं। इस तरह उन परमेश्वरको बीचमें करके वे सब गोपियाँ दूसरे वनमें गयीं, जहाँ सुरम्य रासमण्डल विद्यमान था। रासमण्डलमें जाकर रसिकशेखर श्रीकृष्ण स्वर्णसिंहासनपर विराजमान हुए। जैसे रातके समय आकाशमें तारागणोंके साथ चन्द्रमा शोभा पाते हैं; उसी प्रकार वे गोपियोंके साथ सुशोभित हो रहे थे। जनार्दनने अपनी अनेक मूर्तियाँ प्रकट करके गोपियोंके साथ पुनः रासक्रीड़ा की। नारदजीने पूछा- भक्तजनोंके प्रियतम नारायण ! विद्वान् पुरुष पहले 'राधा' शब्दका उच्चारण करके पीछे 'कृष्ण' का नाम लेते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझ भक्तको बताइये। श्रीनारायण बोले- नारद ! इसके तीन कारण हैं; बताता हूँ, सुनो ! प्रकृति जगत्की माता हैं और पुरुष जगत्के पिता। त्रिभुवनजननी प्रकृतिका गौरव पितृस्वरूप पुरुषकी अपेक्षा सौगुना अधिक है। श्रुतिमें 'राधाकृष्ण', 'गौरीशंकर' इत्यादि शब्द ही सुना गया है। 'कृष्ण-राधा' 'शंकर-गौरी' इत्यादिका प्रयोग कभी लोकमें भी नहीं सुना गया है। 'हे रोहिणीचन्द्र ! प्रसन्न होइये और इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये। संज्ञासहित सूर्यदेव ! मेरे दिये हुए इस अर्घ्यको स्वीकार कीजिये। कमलाकान्त ! प्रसन्न होइये और मेरी पूजा ग्रहण कीजिये।' इत्यादि मन्त्र सामवेदकी